भारतीय नववर्ष को जानें

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18th March 2018 - The First Day of Indian New Year
18th March 2018 - The First Day of Indian New Year

आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम क्या-क्या छोड़े चल रहे हैं क्या इसके बारे में कभी सोचा है आपने? शहरों में रहने की हवस या जरूरत की खातिर हम अपने गांव की मिट्टी की सोंधी सुगंध भूल गए। कम्प्यूटर और स्मार्टफोन ने हमारे बच्चों की मासूमियत छीन ली। अंग्रेजी स्कूल स्टेटस का पैमाना क्या हुए हमारे बच्चे हिन्दी की गिनती तक बिसरा गए। ऐसे में हिन्दी नववर्ष और हिन्दी महीनों से वे अनजान रहें तो क्या आश्चर्य! बहरहाल, 18 मार्च 2018 हिन्दी नववर्ष यानि भारतीय नववर्ष का पहला दिन है… विक्रम संवत् 2075 का पहला दिन और साथ ही चैत्र नवरात्रि का पहला दिन भी। इसलिए पहले इस दिन के निमित्त मंगलकामनाएं और फिर कुछ जरूरी और दिलतचस्प बातें।

चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से आरंभ होता है हमारा भारतीय नववर्ष। इसे सृष्टि-दिवस, नवसंवत्सर या हिन्दू नववर्ष भी कहते हैं। मान्यता है कि इसी दिन यानि आज से एक अरब, 97 करोड़, 39 लाख, 49 हजार व 115 वर्ष पूर्व सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना शुरू की थी। लंका पर विजय हासिल करने के पश्चात् प्रभु राम का और 5120 वर्ष पूर्व धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था। यही विक्रम संवत् का प्रथम दिन है। 2073 वर्ष पूर्व सम्राट् विक्रमादित्य ने इसी दिन अपना अखंड राज्य स्थापित किया था। यही नहीं, भारत सरकार का पंचांग शक संवत् भी आज ही के दिन से शुरू होता है।

अब आगे चलें। विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त करके दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना था। सिंध प्रांत के प्रसिद्ध समाज-रक्षक वरुणावतार माने जाने वाले संत झूलेलाल इसी दिन प्रकट हुए थे। महान बलिदानी सिक्ख परंपरा के द्वितीय गुरु श्री अंगद देव का प्रगटोत्सव इसी दिन हुआ था और समाज को श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्यसमाज की स्थापना के लिए चुना था।

मां आदि शक्ति के नवरात्र यानि बासंतिक नवरात्र का पहला दिन भी यही है। किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए इस दिन का मुहूर्त अत्यंत शुभ माना जाता है। इस समय प्रकृति की ओर देखें तो वह नया श्रृंगार करती दिखेगी। नए रंग-बिरंगे फूलों से पौधे लदे हुए मिलेंगे। यही समय फसल काटने का होता है और किसानों को उनकी मेहनत का फल मिलता है। अर्थात् हमारा भारतीय नववर्ष वैज्ञानिक दृष्टि के साथ-साथ प्राकृतिक एवं सामाजिक संरचना को भी प्रस्तुत करता है।

भारतीय संस्कृति में वर्ष का ऐसा कोई दिन नहीं जिसके भीतर हमारे संस्कारों के कुछ बीज ना मिल जाएं। फिर यह तो वर्ष का पहला दिन है। इस दिन आप सुधी पाठकों से एक विनम्र निवेदन कि हम ‘आधुनिक’ जरूर बनें पर अपनी जड़ों को ना भूलें… अपने बच्चों को हम हिन्दी नववर्ष, हिन्दी महीनों और इनसे जुड़ी संस्कृति का ज्ञान जरूर दें..!! ये हर भारतीय का सांस्कारिक दायित्व है… इसके अभाव में हम भले ही चांद पर घर बना लें, मंगल को छूकर आ जाएं, ‘विश्वगुरु’ दुबारा कभी ना बन पाएंगे..!!!

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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