मनु शर्मा: ‘आत्म’कथाकार का जाना

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Manu Sharma
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पौराणिक कथाओं और पात्रों को आधुनिक संदर्भ में उपन्यासों-कहानियों के जरिए जीवंत करने वाले हिन्दी साहित्य के अप्रतिम साधक पद्मश्री मनु शर्मा का बुधवार सुबह 5:30 बजे निधन हो गया। 89 वर्षीय शर्मा लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। वाराणसी के बड़ी पियरी स्थित आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में स्वच्छता अभियान के प्रथम नवरत्न रहे मनु शर्मा ने डेढ़ दर्जन उपन्यासों के अलावा सौ से अधिक कहानियों और सात हजार से अधिक कविताओं से भरा साहित्य का अद्भुत संसार रचा था। ‘कृष्ण की आत्मकथा’ उनका सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास है। आठ खंडों व 3000 पृष्ठों वाला यह कालजयी उपन्यास हिन्दी का सबसे बड़ा उपन्यास माना जाता है।

मनु शर्मा का जन्म 1928 में अकबरपुर, फैजाबाद में हुआ था। वे बेहद अभावों में पले-बढ़े। घर चलाने के लिए फेरी लगाकर कपड़ा और मूंगफली तक बेचा। फिर बनारस के डीएवी कॉलेज में चपरासी की नौकरी मिली, जहां उनके गुरु कृष्‍णदेव प्रसाद गौड़ उर्फ ‘बेढ़ब बनारसी’ ने उनसे पुस्‍तकालय में काम लिया। पुस्‍तकालय में पुस्‍तक उठाते-उठाते उनमें पढ़ने की ऐसी रुचि जगी कि पूरा पुस्‍तकालय ही चाट गए और इस दुनिया से जब गए तो अपनी रचनाओं का पूरा पुस्तकालय सौंपकर।

70 के दशक में मनु शर्मा बनारस से निकलने वाले ‘जनवार्ता’ में प्रतिदिन एक ‘कार्टून कविता’ लिखते थे। यह इतनी मारक होती थी कि आपात काल के दौरान इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। जयप्रकाश नारायण कहा करते थे – “यदि संपूर्ण क्रांति को ठीक ढंग से समझना हो तो ‘जनवार्ता’ अखबार पढ़ा करो।” मनु शर्मा ने अपनी ‘कार्टून कविता’ के जरिए हर घर-हर दिल पर उस दौरान दस्‍तक दी थी।

मनु शर्मा के प्रशंसकों में एक बड़ा नाम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भी है। उनके उपन्यास ‘कृष्ण की आत्मकथा’ के बारे में उन्होंने कहा था कि  ‘इस रचना को पढ़ने में मैं इतना खो गया कि कई जरूरी काम तक भूल गया था। पहली बार कृष्ण कथा को इतना व्यापक आयाम दिया गया है।’ ‘कृष्ण की आत्मकथा’ के अतिरिक्त ‘द्रौपदी की आत्मकथा’, ‘कर्ण की आत्मकथा’, ‘गांधारी की आत्मकथा’, ‘द्रोण की आत्मकथा’ तथा  ‘अभिशप्त कथा’ उनके अन्य पौराणिक उपन्यास हैं। ‘तीन प्रश्न’, ‘राणा सांगा’, ‘छत्रपति’ तथा ‘एकलिंग का दीवान’ उनके ऐतिहासिक उपन्यास हैं। जबकि ‘मरीचिका’, ‘विवशता’, ‘लक्ष्मण रेखा’ तथा ‘गांधी लौटे’ सामाजिक उपन्यास। राजकुमार हिरानी की मुन्नाभाई सिरीज की दूसरी फिल्म पर ‘गांधी लौटे’ उपन्यास की छाप स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। उनकी अन्य रचनाओं में कहानी संग्रह ‘पोस्टर उखड़ गया’, ‘मुंशी नवनीत लाल’, ‘महात्मा’ तथा ‘दीक्षा’, कविता संग्रह ‘खूंटियों पर टंगा वसंत’ व निबंध संग्रह ‘उस पार का सूरज’ प्रमुख हैं।

मनु शर्मा को मिले सम्मान व अलंकरणों की बात करें तो गोरखपुर विश्वविद्यालय से डी.लिट की मानद उपाधि, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का लोहिया साहित्य सम्मान, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का सुब्रमण्यम भारती पुरस्कार, उत्तर प्रदेश सरकार का सर्वोच्च सम्मान यश भारती सम्मान, साहित्य के लिए मध्य प्रदेश सरकार का मैथिली शरण गुप्त सम्मान और 2015 में मिला पद्मश्री सम्मान विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं।

चलते-चलते मनु शर्मा की एक बड़ी दिलचस्प बात। अपने व्यक्तित्व व रचनाओं के बारे में वे अक्सर कहा करते, ‘आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो बरसों बाद मैं डायनासोर के जीवाश्म की तरह पढ़ा जाऊंगा।’ बिल्कुल सही कहा था उन्होंने। उन जैसे साहित्यकार बीतते समय के साथ और अधिक प्रासंगिक, और अधिक मौजू, और अधिक जरूरी होते चले जाते हैं।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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