सिनेमा हॉल में ना करें तय देशभक्ति

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National Anthem, Patriotism and Cinema Hall
National Anthem, Patriotism and Cinema Hall

सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान बजाए जाने के सवाल पर पर सुप्रीम कोर्ट के रुख में आया बदलाव इस बात का सबूत है कि किसी लोकतांत्रिक देश की जिम्मेदार संस्थाएं कैसे अपनी गलतियों को दुरुस्त कर सकती हैं। इस मसले पर पिछले साल 30 नवंबर को दिए गए अंतरिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान को अनिवार्य बनाते हुए कहा था कि इससे लोगों में देशभक्ति की भावना बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसी से जुड़े एक मसले पर सुनवाई करते हुए सोमवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस धनंजय चंद्रचूड़ की पीठ ने केंद्र सरकार की इस अपील को ठुकरा दिया कि उसे अपने पिछले फैसले में कोई फेरबदल नहीं करना चाहिए।

अदालत ने साफ कर दिया कि राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े कानून में कोई भी फेरबदल करने की जवाबदेही सरकार पर है और उसे अदालत के अंतरिम फैसले से प्रभावित हुए बगैर अपना यह दायित्व निभाना चाहिए। बेशक, इस मौके पर सुप्रीम कोर्ट की ताजा दलीलों को उसके पिछले फैसले के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है, लेकिन इससे कुछ हासिल नहीं होना। बड़ी बात यह है कि कोर्ट को जब अहसास हुआ कि उसके फैसले का दुरुपयोग किया जाने लगा है, सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े न होने वालों को कई जगह मारा-पीटा गया है, तो कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश को नाक का सवाल बनाए बगैर इसमें संशोधन करने का रास्ता अपनाया।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक उदार समाज की जरूरतों को भी रेखांकित किया। अदालत ने टिप्पणी की कि सिनेमा हॉलों में लोग मनोरंजन के लिए जाते हैं, जो समाज के लिए जरूरी है। कल को कोई सवाल उठा सकता है कि आप शॉर्ट्स पहनकर सिनेमा देखने नहीं जा सकते, क्योंकि वहां राष्ट्रगान होता है। ऐसी मोरल पुलिसिंग की हद कहां तय की जाएगी? साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने रुख में बदलाव कर सभी संबंधित पक्षों को लोकतांत्रिक मर्यादाओं की याद दिलाई है। उम्मीद करें कि केंद्र सरकार इन मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ेगी।

बोल डेस्क [सौ. नवभारत टाइम्स]

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