अमिताभ, जिनके लिए 75 एक संख्या भर है

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Amitabh Bachchan
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अमिताभ को समझने के लिए हमें कुछ पीछे जाना होगा। उनकी जिंदगी की उन महत्वपूर्ण घटनाओं व परिस्थितियों को टटोलना होगा, जिनकी वजह से अमिताभ बच्चन एक नाम न होकर एक विचार हो गए हैं और आज 75 उनके लिए एक संख्या भर है। अमिताभ के 75वें जन्मदिन पर विशेष।

अमिताभ बच्चन हमारे सामने तब फिल्मों में आए, जब हमने हर तारीख को अपनी जिंदगी से जोड़ना शुरू किया था। इन सालों में उन्होंने अपनी जिंदगी तो जी ही, हमें भी हर दौर में जिंदगी जीने का एक फ्रेमवर्क थमाते रहे।

बहुत कम बातें हैं अमिताभ बच्चन के बारे में, जो सबको पता नहीं। पिछले पांच दशकों से हर साल उनके जन्मदिन पर तमाम पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में उनकी निजी जिंदगी, फिल्म, टेलीविजन, राजनीति और सोशल मीडिया से जुड़ी तमाम जानकारियां बार-बार दिखाई-पढ़ाई जाती हैं। जब से अमिताभ बच्चन ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम करना शुरू किया, उनकी जिंदगी एक खुली किताब की तरह रही है। अमिताभ बच्चन भले अंतर्मुखी स्वभाव के हों, बेशक वह मीडिया से खुलकर अपने दिल की बातें न कहते हों, बावजूद इसके उनकी हर गतिविधि पर पैपराजी की नजर रहती है। वह लगभग हर रोज ट्वीट करते हैं, उनके करोड़ों फॉलोअर हैं। ट्वीट के जरिए वह बता चुके हैं कि इस साल वह जन्मदिन नहीं मना रहे। मगर हर उम्र व वर्ग के उनके प्रशंसक 75वें जन्मदिन को एक माइल स्टोन मानते हुए उन्हें शुभकामनाएं और बधाइयां दे रहे हैं।

75… इस उम्र में एक दादा या नाना दूर बसे अपने नाती-पोतों के फोन कॉल का इंतजार करते हैं। पोते-परपोते फोन पर हैप्पी बर्थडे ग्रेंड पा गुनगुनाते हैं। जीवन के संध्या काल में इसे ही खुश होने की वजह मान लेता है वह शख्स। लेकिन अमिताभ बच्चन ऐसा न कर रहे हैं, न कह रहे हैं। अमिताभ को समझने के लिए हमें कुछ पीछे जाना होगा। उनकी जिंदगी की उन महत्वपूर्ण घटनाओं व परिस्थितियों को टटोलना होगा, जिनकी वजह से अमिताभ बच्चन एक नाम न होकर एक विचार हो गए हैं।

साल 1973। इससे पहले वह खुद को बतौर नायक स्थापित नहीं कर पाए थे। ‘आनंद’ ने जरूर उन्हें एक संजीदा कलाकार की पंक्ति में ला खड़ा कर दिया, पर इससे पहले तक उन्हें अवहेलनाओं और अपमानों का लंबा दौर झेलना पड़ा। अपनी कद-काठी, चेहरे-मोहरे को लेकर ताराचंद बड़जात्या जैसे नामी निर्माता-निर्देशक से भी उन्हें यह सुनना पड़ा था कि तुममें नायकों वाली बात नहीं है। ‘जंजीर’ ने कई मिथ तोड़े। कई दूसरे नायकों ने जिस भूमिका को करने से हाथ खींच लिया था, उसी भूमिका ने अमिताभ बच्चन को सितारा बना दिया। अमिताभ बच्चन के जरिए युवाओं को मिल गया एंग्री यंग मैन। इस दौर ने अमिताभ बच्चन को नायक के रूप में स्थापित किया, तो वहीं से आम आदमी को भी एक रास्ता मिलता दिखाई दिया कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बाहर से आया एक आम शक्लोसूरत का बंदा भी सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। इसके बाद तो अमिताभ बच्चन लगातार ऊपर ही चढ़ते गए। फिर एक वक्त ऐसा भी आया, जब उन्हें वन मैन इंडस्ट्री कहा जाने लगा।

इस गति को ठहराव मिला उनके फिल्मी करियर के दूसरे पड़ाव पर। साल 1982। अमिताभ बच्चन के प्रिय निर्देशक मनमोहन देसाई की फिल्म ‘कुली’ लगभग बन चुकी थी। बेंगलुरु में एक फाइट दृश्य को फिल्माते समय अमिताभ बच्चन गंभीर रूप से चोटिल हो गए। जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे अमिताभ बच्चन। पूरा देश शोक में डूब गया। अमिताभ बच्चन की वापसी के दो परिणाम सामने आए, एक ‘कुली’ का अंत बदल दिया गया और नायक को जीवित दिखाया गया। दूसरे, वह फिल्म सुपर हिट रही और अमिताभ बच्चन ने माना कि अब जिंदगी में किसी बात से उन्हें डर नहीं लगता, मौत से भी नहीं।

‘कुली’ के बाद उनका करियर ढलान पर आने लगा। कुछ गलत फिल्में, ढलती उम्र, नए उभरते नायक, उनका सिंहासन डोलने लगा। वक्त आया, ठहरकर कुछ निर्णय लेने का और अपने आपको नए ढंग से पेश करने का। अमिताभ ने इस वक्त को ‘मिड लाइफ क्राइसिस’ कहा। नए निर्णयों ने अमिताभ बच्चन के सामने उनकी जिंदगी का सर्वाधिक क्रूर व कारोबारी संकट खड़ा कर दिया।

साल था 2000। टेलीविजन की दुनिया अपने पंख पसार रही थी और अमिताभ बच्चन ने भी इस दुनिया का हिस्सा बनने के लिए अपनी कंपनी एबीसीएल खोल ली। महज पांच साल में इस कंपनी को इतना घाटा सहना पड़ा कि अमिताभ सड़क पर आ गए। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, ‘मेरे लिए यह जिंदगी का सबसे कठिन समय था। मैं अपने आप से और जिंदगी से तब भी नहीं घबराया, जब ‘कुली’ के दौरान मरते-मरते बचा था। मेरे ऊपर इतना कर्ज था कि मैं रातों को सो नहीं पाता था, खाना-पीना बंद। मुझे अपने रहने का अर्थ ही समझ नहीं आ रहा था। फिर एहसास हुआ कि मुझको लड़ना चाहिए, चाहे नतीजा जो निकले।’

अमिताभ बच्चन के घर के पास रहते थे उनके मित्र और निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा। एक पूरी रात उन्होंने सुबह होने भर का इंतजार किया और अपने मित्र के घर पहुंच कर पहली बार उनसे काम मांगा। यश चोपड़ा उन दिनों अपने बेटे आदित्य चोपड़ा की फिल्म ‘मोहब्बतें’ की कहानी गढ़ रहे थे। उन्होंने फौरन फिल्म फ्लोर पर उतारा और अमिताभ बच्चन को गुरुकुल के प्राचार्य की भूमिका के लिए साइन कर लिया। इसके तुरंत बाद अमिताभ बच्चन टीवी की दुनिया में ‘कौन बनेगा करोड़पति’ शो से जुड़ गए। इस शो की कामयाबी ने उनके सारे कर्ज चुकता कर दिए। यह भी माना कि जिंदगी में कुछ निर्णय गलत हो सकते हैं, पर यह जिंदगी का अंत नहीं है। इस दौर में अमिताभ बच्चन बड़ी आसानी से नायक की सीढ़ी से उतरकर चरित्र भूमिकाएं निभाने लगे और इस तरह की भूमिकाओं को उन्होंने एक बड़ा कद दे दिया।

यही वह जज्बा था कि बाद के सालों में वह ‘ब्लैक’, ‘पा’, ‘पीकू’, ‘पिंक’ जैसी फिल्मों में बेहतरीन और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं कर पाए। उनकी उम्र के अधिकांश नायक वक्त के साथ अपने आपको बदलने में असमर्थ रहते हैं और नई परिस्थिति के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाते।

अपनी 75 साल की जिंदगी में तमाम उतार-चढ़ाव देखने वाला यह शख्स आज भी यही मानता है कि उसने एक आम इंसान की तरह जिंदगी जी है। उनके स्थान पर जो भी होता, वह उन्हीं की तरह परिस्थितियों का मुकाबला करता, लड़ता, और आगे बढ़ने की कोशिश करता। आगे बढ़ने की कोशिश उनकी जिंदगी का एक ऐसा सूत्र वाक्य है, जो आम आदमी को उत्साहित करता है। यही वजह है कि धीरे-धीरे अमिताभ एक नाम या व्यक्ति भर नहीं रहे, एक विचार बन रहे हैं। अपनी जिंदगी को अनुशासित, रचनात्मक, जुझारू व भरपूर तरीके से जीने वाला ऐसा शख्स, जो किसी भी उम्र में रुकता नहीं, जिसने समय के साथ अपने को बदला है, वह आज भी विज्ञापनों का चहेता चेहरा है, खूब कमाता है, जिसकी जादू की एक झप्पी पाने को बच्चे, युवा, उम्रदराज सब हसरतमंद रहते हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए 75 सिर्फ एक संख्या भर है।

बोल डेस्क [‘हिन्दुस्तान’ में जयंती रंगनाथन (‘नित नया आसमां रचते अमिताभ’) से साभार]

 

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