राष्ट्रभाषा पर बापू की दो टूक

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Mahatma Gandhi
Mahatma Gandhi

आजादी की लड़ाई में गांधीजी के लिए भाषा का सवाल बहुत बड़ा था। उन्हें राजनीतिक स्वतंत्रता से जरा भी कम चिन्ता ‘भाषाई स्वतंत्रता’ की नहीं थी। हिन्दुस्तान की महान भाषाओं की अवगणना से हिन्दुस्तान को होने वाला नुकसान उन्हें किस कदर सालता था, अंग्रेजी भाषा की ‘मोहिनी’ की उन्हें कैसी पहचान थी और हिन्दी ही राष्ट्रभाषा हो, इस पर उनकी कितनी दृढ़ राय थी – चलिए, इन सारी बातों को जानें उन्हीं की कलम से… 2 अक्टूबर, उनकी जयंती पर उन्हें नमन करते हुए।बोल डेस्क

हमने अपनी मातृभाषाओं के मुकाबले अंग्रेजी से ज्यादा मुहब्बत रखी, जिसका नतीजा यह हुआ कि पढ़े-लिखे और राजनीतिक दृष्टि से जागे हुए ऊंचे तबके के लोगों के साथ आम लोगों का रिश्ता बिल्कुल टूट गया और उन दोनों के बीच एक गहरी खाई बन गई। यही वजह है कि हिन्दुस्तान की भाषाएं गरीब बन गई हैं, और उन्हें पूरा पोषण नहीं मिला। अपनी मातृभाषा में दुर्बोध और गहरे तात्विक विचारों को प्रकट करने की अपनी व्यर्थ चेष्टा में हम गोते खाते हैं। हमारे पास विज्ञान के निश्चित पारिभाषिक शब्द नहीं हैं। इस सबका नतीजा खतरनाक हुआ है। हमारी आम जनता आधुनिक मानस यानि नए जमाने के विचारों से बिल्कुल अछूती रही है।

हिन्दुस्तान की महान भाषाओं की जो अवगणना हुई है और उसकी वजह से हिन्दुस्तान को जो बेहद नुकसान पहुंचा है, उसका कोई अंदाजा या माप आज हम निकाल नहीं सकते, क्योंकि हम इस घटना के बहुत नजदीक हैं। मगर इतनी बात तो आसानी से समझी जा सकती है कि अगर आज तक हुए नुकसान का इलाज नहीं किया गया, यानि जो हानि हो चुकी है, उसकी भरपाई करने की कोशिश हमने न की, तो हमारी आम जनता को मानसिक मुक्ति नहीं मिलेगी, वह रूढ़ियों और वहमों से घिरी रहेगी। नतीजा यह होगा कि आम जनता स्वराज्य के निर्माण में कोई ठोस मदद नहीं पहुंचा सकेगी।

अहिंसा की बुनियाद पर रचे गए स्वराज्य की चर्चा में यह बात शामिल है कि हमारा हरेक आदमी आजादी की हमारी लड़ाई में खुद स्वतंत्र रूप से सीधा हाथ बंटाए। लेकिन अगर हमारी आम जनता लड़ाई के हर पहलू और उसकी हर सीढ़ी से परिचित न हो और उसके रहस्य को भली-भांति न समझती हो, तो स्वराज्य की रचना में वह अपना हिस्सा किस तरह अदा करेगी? और जब तक सर्व-साधारण की अपनी बोली में लड़ाई के हर पहलू व कदम को अच्छी तरह समझाया नहीं जाता, उनसे यह उम्मीद कैसे की जाए कि वे उसमें हाथ बंटाएंगे?

समूचे हिन्दुस्तान के साथ व्यवहार करने के लिए हमको भारतीय भाषाओं में से एक ऐसी भाषा की जरूरत है, जिसे आज ज्यादा-से-ज्यादा तादाद में लोग जानते और समझते हों और बाकी के लोग जिसे झट सीख सकें। इसमें शक नहीं कि हिंदी ही ऐसी भाषा है। उत्तर के हिंदू और मुसलमान, दोनों इस भाषा को बोलते और समझते हैं। यही भाषा जब उर्दू लिपि में लिखी जाती है, तो उर्दू कहलाती है। राष्ट्रीय कांग्रेस ने सन् 1925 के अपने कानपुर अधिवेशन में जो मशहूर प्रस्ताव पास किया था, उसमें सारे हिन्दुस्तान की इसी भाषा को हिन्दुस्तानी कहा गया है। और तब से सिद्धांत में ही क्यों न हो, हिन्दुस्तानी राष्ट्रभाषा मानी गई है। ‘सिद्धांत में’ मैंने जान-बूझकर कहा है। क्योंकि खुद कांग्रेसवालों ने भी इसका जितना अभ्यास करना चाहिए नहीं किया। हिन्दुस्तान की आम जनता की राजनीतिक शिक्षा के लिए हिन्दुस्तान की भाषाओं के महत्व को पहचानने और मानने की एक खास कोशिश सन् 1920 में शुरू की गई थी। इसी हेतु से इस बात का खास प्रयत्न किया गया था कि सारे हिन्दुस्तान के लिए एक जैसी भाषा को जान और मान लिया जाए, जिसे राजनीतिक दृष्टि से जागा हुआ हिन्दुस्तान आसानी से बोल सके और अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आम जलसों में इकट्ठे होने वाले हिन्दुस्तान के अलग-अलग प्रांतों से आए हुए कांग्रेसी समझ सकें। इस राष्ट्रभाषा को हमें इसी तरह सीखना चाहिए, जिससे हम सब इसकी दोनों शैलियों को समझ और बोल सकें और इसे दोनों लिपियों में लिख सकें।

बहुत से कांग्रेसजनों ने इस ठहराव पर अमल नहीं किया। मेरी समझ में इसका एक शर्मनाक नतीजा यह हुआ है कि आज भी अंग्रेजी बोलने का आग्रह रखनेवाले और अपने समझने के लिए दूसरों को अंग्रेजी में ही बोलने के लिए मजबूर करनेवाले कांग्रेसजनों का बेहूदा दृश्य हमें देखना पड़ता है। अंग्रेजी भाषा ने हम पर जो मोहिनी डाली है, इसके असर से हम अभी तक छूटे नहीं हैं। इस मोहिनी के वश होकर हम लोग हिन्दुस्तान को अपने ध्येय की ओर आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। जितने साल हम अंग्रेजी सीखने में बरबाद करते हैं, उतने महीने भी अगर हम हिन्दुस्तानी सीखने की तकलीफ न उठाएं, तो सचमुच कहना होगा कि जन-साधारण के प्रति अपने प्रेम की जो डींगें हम हांका करते हैं, वे निरी डींगें ही हैं।

महात्मा गांधी [सौ. ‘हिन्दुस्तान’]

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