तस्लीमुद्दीन का जाना

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Taslimuddin
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अपने कद्दावर व्यक्तित्व, निर्भीक अंदाज और बेबाक बयानों से बिहार, खासकर सीमांचल की राजनीति को लगभग पांच दशकों तक प्रभावित करने वाले मोहम्मद तस्लीमुद्दीन नहीं रहे। रविवार को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे 74 वर्ष के थे। आरजेडी के वरिष्ठ नेता तस्लीमुद्दीन का विवादों से भले ही चोली-दामन का रिश्ता रहा हो, बिहार में अल्पसंख्यकों के वे बड़ा चेहरा थे, इसमें कोई दो राय नहीं। जब तक आम जनता में पैठ न हो तब तक छह बार विधायक और पांच बार सांसद होना मुमकिन नहीं। तस्लीमुद्दीन अभी भी अररिया से सांसद थे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान समेत सभी दलों के नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया है। नीतीश कुमार ने कहा कि तस्लीमुद्दीन एक प्रख्यात राजनेता एवं प्रसिद्ध समाजसेवी थे। उनके निधन से न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी अपूरणीय क्षति हुई है।

मधेपुरा के पूर्व सांसद एवं दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे डॉ. आरके यादव रवि ने उन्हें भावुक होकर याद किया और कहा कि तस्लीमुद्दीन के रूप में मैंने अपना एक प्रिय मित्र खो दिया। सीमांचल के इस लोकप्रिय व जूझारू चेहरे के यूं अचानक चले जाने से बिहार की राजनीति में एक शून्यता-सी आ गई है। डॉ. रवि ने 1981 से लेकर 1989 तक बिहार विधानसभा के सदस्य के रूप में और 1989 के बाद लोकसभा व राज्यसभा के सदस्य के रूप में तस्लीमुद्दीन के साथ बिताए पलों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

बता दें कि तस्लीमुद्दीन सरकारी आश्वासन समिति के टूर पर चेन्नई गए थे, जहां उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें सांस लेने में तकलीफ और खांसी में खून आने की शिकायत थी। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया और बचाने की हर संभव कोशिश की गई, पर उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई और रविवार दोपहर बाद उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को दो बजे दिन में अररिया के जोकीहाट में राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

4 जनवरी 1943 को जन्मे तस्लीमुद्दीन छात्रजीवन में ही राजनीति में आ गए थे। 1969 में वे पहली बार जोकीहाट से कांग्रेस के विधायक बने। 1972 में उन्होंने यह सीट निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर और 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जीती। 1980 और 1985 में वे अररिया से विधायक चुने गए। 1995 में फिर से वे जोकीहाट से विधायक बने। लेकिन इस बीच 1989 में वे जनता दल उम्मीदवार के तौर पर पूर्णिया से सांसद भी रहे। 1996 में वे किशनगंज से सांसद चुने गए और देवगौड़ा सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे। 1998 में यहां से उन्होंने फिर जीत दर्ज की पर 1999 में शाहनवाज हुसैन के हाथों यह सीट उन्हें गंवानी पड़ी। लेकिन 2004 में उन्होंने एक बार फिर यह सीट जीत ली। इसके बाद 2014 में वे अररिया से सांसद चुने गए। गौरतलब है कि केन्द्र में मंत्री रहने के अलावा तस्लीमुद्दीन बिहार सरकार में भी कई विभागों के मंत्री रहे थे। अपने जीवन का अधिकांश सार्वजनिक जीवन को देने वाले और कभी हार न मानने वाले तस्लीमुद्दीन का जिन्दगी की जंग इस तरह हार कर चला जाना सचमुच खलता है।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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