नायक का मोह

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Our Enduring Fascination for Nayak
Our Enduring Fascination for Nayak

अजीब तर्क दिया जा रहा है। वे कह रहे हैं कि विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं है। कोई ऐसा नेता नहीं है, जो मोदीजी का विकल्प हो। असल में, यह उन लोगों का तर्क है, जो नायक के सहारे समाज की मुक्ति के दिवास्वप्न देखते हैं। नायक केन्द्रित मनोदशा हमारी राजनीति की रही है। उसने नायक पूजा को सबसे बड़ा बनाया है। अभावों में जीने वाले लोग हमेशा नायक में मुक्ति की खोज करते हैं। नायक पूजा की संस्कृति निर्मित करके हमने देश को शक्तिशाली बनाया या खोखला? क्या भारत को नायक चाहिए या विकल्प में कुछ और चाहिए? हम वैचारिक संकट के समय नायक की तलाश सबसे ज्यादा करते हैं। हम अच्छे विचार नहीं खोजते, अच्छे मूल्य नहीं खोजते, चाहे वह मूल्यहीन हो।

भारत में नायक का विचार अजर-अमर है। एक के जाते ही हठात् दूसरा हमारी आंखों के सामने आ बैठता है। भारत को नायक खोजने की इस बीमारी से कैसे छुट्टी दिलाई जाए। हम सबको नायक केन्द्रित राजनीति की बजाय जन-राजनीति पर जोर देना चाहिए। हमारी राजनीति में जनता की समस्याएं केन्द्र में नहीं रहतीं, नायक केन्द्र में रहता है। नायक के भाषण, जश्न जलसों और शोहरत से आम जनता के जीवन में खुशहाली आने वाली नहीं है, ये सारी चीजें तो सिर्फ नायक के मोह में बांधे रखने की कला के नुस्खे हैं।

बोल डेस्क [‘नया जमाना’ में जगदीश्वर चतुर्वेदी]

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