बलात्कारी बाबा को सजा

0
11
Gurmeet Ram Rahim Singh

आखिरकार डेरा सच्चा सौदा प्रमुख स्वघोषित ‘परमात्मा’ राम रहीम को दो नाबालिग साध्वियों के साथ बलात्कार करने के अपराध में सीबीआइ अदालत ने सोमवार को बीस साल के सश्रम कारावास और तीस लाख रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई। देश-विदेश में बहुचर्चित पंद्रह साल से किसी भयावनी फिल्म या थ्रिलर की तरह घूम रही इस अपराध-कथा की एक-एक कड़ी के कई-कई कोण और पहलू हैं। यह बलात्कार के अपराध के साथ-साथ एक शातिर, ढोंगी बाबा के अतिशय ताकतवर बन जाने और धर्म, सियासत, प्रशासन और समाज को अपना गुलाम बना लेने की अंधेरगर्दी भरी कारस्तानी है। कहते हैं कि कि देर है, अंधेर नहीं। राम रहीम को दोषी ठहराए जाने और उसे हुई सजा ने न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा और मजबूत किया है। यह फैसला एक ऐसा दस्तावेज बनेगा, जो बताएगा कि जब कई राजनीतिक और कई नौकरशाह चाकरों की तरह एक अरबपति बहुरुपिए बाबा के चरणों में घुटने टेक चुके थे और एक करुण पुकार की अनसुनी हो रही थी तब कैसे न्यायपालिका ने एक अनाम फरियादी पत्र का संज्ञान लेकर पीड़ितों को सहारा दिया था।

इस इंसाफ का श्रेय दोनों पीड़िताओं के अथक संघर्ष, एक साहसी पत्रकार की शहादत, सीबीआई के ईमानदार अफसरों और अंतत: जजों के साहस और कानून तथा न्याय के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को जाता है। सबसे ज्यादा लज्जित किसी ने किया है तो राजनीतिकों ने। दरअसल इस कांड के उद्घाटन की शुरुआत तब हुई जब पंजाब की एक पीड़िता ने 2002 में पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट को एक गुमनाम पत्र की प्रतिलिपि भेजी। यह पत्र तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, गृहमंत्री और सीबीआई के निदेशक को भेजा गया था। लेकिन संज्ञान सिर्फ उच्च न्यायालय ने लिया। सिरसा के तत्कालीन जिला और सत्र न्यायाधीश एमएस सुलार के योगदान को नकारना भूल होगी, जिन्होंने उच्च न्यायालय के आदेश पर इस घटना की तहकीकात की। इन्हीं न्यायमूर्ति सुलार की टिप्पणी के बाद उच्च न्यायालय ने पीड़िता के गुमनाम पत्र को याचिका मानते हुए 24 सितंबर, 2002 को सीबीआई को मामले की जांच करने को कहा था। इस बीच सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति ने अपने सांध्य दैनिक ‘पूरा सच’ में इस पत्र को छाप दिया। फिर उनकी हत्या हो गई। आरोप है कि इस हत्या को राम रहीम के गुंडों ने अंजाम दिया। इसकी सीबीआई जांच चल रही है।

विडंबना यह है कि तत्कालीन चौटाला सरकार ने कई दिन तक अस्पताल में जीवित रहे छत्रपति का बयान दर्ज नहीं किया। क्या वह राम रहीम को बचाना चाहती थी? इस बीच रंजीत नामक एक और युवक की हत्या कर दी गई, जो डेरे में सेवादार था। राम रहीम को शक था कि रंजीत ने ही वह पत्र हाइकोर्ट समेत तमाम जगहों पर भिजवाया। यह मामला भी सीबीआई अदालत में विचाराधीन है। यह विचित्र है कि फैसला सुनाए जाने के दिन, हाइकोर्ट के बार-बार ताकीद करने के बावजूद, हरियाणा सरकार ने पंचकूला में राम रहीम के डेढ़ लाख समर्थकों को जुटने दिया। वरना जो भारी हिंसा और अराजकता हुई उससे बचा जा सकता था। हाइकोर्ट के पूर्ण पीठ को यह टिप्पणी करनी पड़ी कि सरकार ने अपने सियासी फायदे के लिए शहर को जलने दिया। बलात्कारी बाबा को पिछली कांग्रेस सरकार ने जेड प्लस सुरक्षा दी थी, जिसे भाजपा सरकार ने भी जारी रखा। पिछला विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा बाबा के आगे नतमस्तक हो गई। अगर गुरमीत राम रहीम सिंह इतना ताकतवर हो गया, तो इसके लिए हमारी राजनीति भी बहुत हद तक जिम्मेवार है।

बोल डेस्क [संपादकीय ‘अपराध और दंड’, जनसत्ता]

Comments

comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here