शरद ने लिखी अपनी ‘विदाई’ की पटकथा

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Sharad Yadav
Sharad Yadav

तेजस्वी-प्रकरण से उपजी स्थितियों के बाद जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के महागठबंधन छोड़ने और एनडीए के साथ सरकार बनाने के निर्णय से ‘असहमति’ रख रहे शरद यादव की ‘चुप्पी’ अब टूट गई है। ‘जो’ कुछ उनके भीतर चल रहा था, तीन दिवसीय दौरे पर पटना पहुंचने के साथ ‘वो’ बाहर आ गया है। यहां संवाददाताओं से बात करते हुए उन्होंने नीतीश कुमार पर बिहार की जनता को ‘धोखा’ देने का आरोप लगाया और कहा कि इस पर जनता क्या सोचती है, यह जानने आया हूं। साथ ही उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वे अब भी महागठबंधन के साथ हैं। शरद यादव के इस रुख के बाद जेडीयू द्वारा उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तयप्राय हो गई है।

बता दें कि शरद यादव अपनी तीन दिनों की यात्रा में बिहार के लगभग सात जिलों में दो दर्जन से ज्यादा जगहों पर जाकर जनता से ‘संवाद’ करेंगे। उनकी इस यात्रा को नीतीश कुमार व जेडीयू से उनके औपचारिक अलगाव के तौर पर देखा जा रहा है। आज हवाई अड्डे पर उनके स्वागत के लिए जुटे लोगों में ज्यादातर आरजेडी के थे और हद तो तब हो गई जब उनके जिन्दाबाद के साथ नीतीश मुर्दाबाद के नारे भी लगे। स्वाभाविक तौर पर जेडीयू ने उनके इस कार्यक्रम से अपने तमाम कार्यकर्ताओं को दूर रहने का कड़ा निर्देश दिया है।

इस बीच बिहार जेडीयू के अध्यक्ष व सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि शरद यादव की ये गतिविधियां जारी रहीं तो पार्टी निकट भविष्य में कोई भी निर्णय ले सकती है। इसका मतलब साफ है कि नीतीश कुमार किसी बड़े निर्णय पर पहुंच चुके हैं। इसकी झलक तभी देखने को मिल गई थी जब राष्ट्रीय महासचिव अरुण श्रीवास्तव को गुजरात के राज्यसभा चुनाव में नीतीश के निर्णय के खिलाफ जाकर पोलिंग एजेंट बहाल करने और वहां के एकमात्र जेडीयू विधायक का वोट कांग्रेस उम्मीदवार को जाने के कारण निलंबित कर दिया गया था। अरुण श्रीवास्तव शरद के कितने करीबी हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है।

गौरतलब है कि शरद यादव ने हाल के दिनों में कई बार पार्टी लाईन से अलग स्टैंड लिया है। तेजस्वी के मुद्दे पर महागठबंधन छोड़ने में उन्हें जनता के साथ धोखा दिखता है लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति को ताक पर रख देने में कोई आपत्ति नहीं है। लालू और उनके परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर उन्होंने चुप्पी साध रखी है। वो यह भी नहीं देख पा रहे कि पार्टी का एक भी विधायक उनके स्टैंड के साथ नहीं है। एक बात और, 17 अगस्त को उन्होंने दिल्ली में विपक्षी दलों के सम्मेलन की योजना भी बना रखी है। अगर उन्हें विपक्षी दलों के समर्थन का इतना ही भरोसा है तो वे राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा क्यों नहीं दे देते? डेढ़ दर्जन पार्टियों में से कोई उन्हें चुनकर दुबारा भेज दे सकती है! पर शरद जानते हैं कि ऐसा होना कितना मुश्किल है। ऐसे में कहना गलत न होगा कि उन्होंने अपनी ‘विदाई’ की पटकथा लिखी है, ताकि पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दे और उनकी राज्यसभा की सदस्यता बची रहे।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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