मुगलसराय से उसकी याद्दाश्त मत छीनिए

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Mughalsarai
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अगर आपकी याद्दाश्त चली जाए, तो क्या होगा? आपको नए सिरे से दुनिया का ज्ञान मिल जाए तो भी? हो सकता है याद्दाश्त की हर बात अच्छी न हो, लेकिन उन्हीं को सहेजते, उन्हीं से सीखते, उनमें ही कुछ नया जोड़ते हुए आप बने हैं। याद्दाश्त के साथ आपकी समूची शख्सियत चली जाएगी। आपकी पहचान, आपका वजूद चला जाएगा। आप, आप रहेंगे ही नहीं, कोई और होंगे, जिसका कोई इतिहास नहीं होगा, जिसकी जड़ें नहीं होंगी। आपके लिए सारी दुनिया बड़ी इकहरी, एकरस और बेमानी होगी। शहर का नाम उसकी याद्दाश्त होता है। जैसे मुगलसराय।

इस नाम में चटगांव से काबुल तक जाने वाली उस महान जीटी रोड का समूचा इतिहास समाया है, जिसकी शुरुआत मौर्य काल में हुई, जिसे शेरशाह सूरी ने पुनर्निर्मित किया, जिसे मुगलों ने देश की धड़कन में बदला और जिसे मुगलों ने देश की धड़कन में बदला और जिसे अंग्रेजों ने कुछ और बढ़ाया।

मुगलसराय हिन्दुस्तान की तारीख है, उसकी पहचान है। यह एक नाम उस पुराने हिन्दुस्तान की जिन्दा तस्वीर है, जिसे खोकर हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान नहीं रह जाएगा, कुछ और भले हो जाए। और दांव पर सिर्फ एक नाम नहीं, हिन्दुस्तानी कौम की तहजीबी याद्दाश्त है। इसलिए इसे बचाने के लिए लड़िए।

बोल डेस्क [‘जनचौक’ में आशुतोष कुमार]

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