उपराष्ट्रपति चुनाव: वैंकेया को क्यों चुना मोदी ने?

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Narendra Modi-Venkaiah Naidu-Amit Shah
Narendra Modi-Venkaiah Naidu-Amit Shah

भाजपा ने दक्षिण में पार्टी के बड़े चेहरे और संघ परिवार के करीबी वेंकैया नायडू को एनडीए का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है। इसकी अटकलें लंबे समय से थीं कि पार्टी इस पद के लिए वेंकैया नायडू का नाम आगे कर सकती है। सोमवार को ये अटकलें सही साबित हुईं। लेकिन प्रश्न उठता है, वैंकेया ही क्यों? दरअसल, मोदी इस पद के लिए ऐसा उम्मीदवार चाहते थे जिसे संसदीय कार्य में महारत हासिल हो और साथ ही विपक्षी दलों के साथ उसके अच्छे संबंध हों। नायडू इस पैमाने पर बिल्कुल फिट थे। इसके अलावा एक दक्षिण भारतीय को उपराष्ट्रपति बनाकर दक्षिणी राज्यों में भाजपा की पैठ बढ़ाने की रणनीति के लिहाज से भी नायडू मुफीद थे। बहरहाल, अगर वह उपराष्ट्रपति चुन लिए जाते हैं तो ऐसा पहली बार होगा जब देश के तीन बड़े संवैधानिक पदों – राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री – पर भाजपा का कब्जा होगा।

आंध्र से आने वाले वैंकेया भाजपा के पुराने सिपाही रहे हैं। 1967 में उन्होंने अपना सफर एबीवीपी के युवा छात्र नेता के तौर पर शुरू किया और 1973 में जनसंघ ज्वाइन किया। यहां से उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष और फिर केन्द्रीय मंत्री बनने तक का सफर तय किया। इतने लंबे समय से पार्टी में रहते हुए भी वह कभी किसी बड़े विवाद में नहीं पड़े। हर मौके पर उन्हें अच्छा पद मिलता रहा। पार्टी में भी सरकार में भी। 1980 से 1985 तक वह आंध्र प्रदेश में भाजपा विधायक दल के नेता रहे। 1988 से 1993 तक उन्होंने आंध्र भाजपा के अध्यक्ष के रूप में काम किया। इसके बाद वह केन्द्रीय राजनीति में आए और 1993 से 2000 तक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव रहे। जुलाई 2002 से दिसंबर 2002 और जनवरी 2004 से अक्टूबर 2004 तक वैंकेया पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। अध्यक्ष के रूप में उनका दोनों कार्यकाल संक्षिप्त रहा, लेकिन उन्होंने पार्टी का फैसला चुपचाप माना। 1996 से 2000 के बीच उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता की भूमिका भी निभाई। मीडिया से उनके बहुत अच्छे संबंध रहे और पत्रकारों में उनकी खासी पैठ बताई जाती है।

वैंकेया नायडू को सरकार के संकटमोचक के तौर पर भी जाना जाता है। कई बड़े मुद्दों पर उन्होंने आगे आकर कभी अपने तीखे तो कभी मजाकिया लहजे में विपक्ष को शांत कराने का काम किया है। उन्हें संसदीय कामकाज का बड़ा अनुभव रहा है। संसदीय कार्यमंत्री का सफल दायित्व निभा चुकने के अलावे वह 1998 से लगातार चौथी बार राज्यसभा के सदस्य हैं। राज्यसभा के सभापति के तौर यह अनुभव उन्हें काफी काम आएगा। गौरतलब है कि उपराष्ट्रपति यह भूमिका पदेन रूप से निभाते हैं।

एक बात और, वैंकेया वक्त की नब्ज समझने और समय के साथ चलने की ‘कला’ बखूबी जानते हैं। यही कारण था कि कभी आडवाणी के विश्वासपात्र रहे वैंकेया, मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के समय आडवाणी के विरोधी खेमे में दिखाई दिए। कल को उनकी यही ‘कला’ उन्हें राष्ट्रपति भवन भी पहुंचा दे, तो बड़ी बात नहीं। जहां तक इस चुनाव का प्रश्न है, पर्याप्त संख्याबल के कारण उनके उपराष्ट्रपति बनने में कोई कठिनाई नहीं दिख रही। हां, कोई चमत्कार हो जाए तो बात अलग है।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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