डिजिटल दुनिया में ध्यान खोते बच्चे

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Kshama Sharma
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कुछ दिनों पहले एक समारोह में एक नामी स्कूल के प्रिंसिपल और कुछ अध्यापकों से मुलाकात हुई थी। बात आजकल के बच्चों पर होने लगी, तो सभी ने एक सुर में कहा कि आजकल के बच्चे बहुत जागरूक हैं। होशियार हैं। मगर वे लगकर कोई काम नहीं करना चाहते। इस मसले पर माता-पिता तथा परिवारी जनों का भी यही मानना है कि बच्चे अब बहुत देर तक कोई काम नहीं करते। पढ़ते वक्त भी बार-बार फोन पर मैसेज चेक करते हैं, कोई गेम खेलने की कोशिश करते हैं या कुछ और। उनका ध्यान एक ही बात पर केंद्रित होना मुश्किल होता जा रहा है। टोको, तो कहते हैं कि यह मल्टी टास्किंग का जमाना है। लेकिन वैज्ञानिकों की मानें, तो दिमाग एक वक्त पर एक ही काम ठीक तरह से कर सकता है। बार-बार ध्यान बदलने से वह कोई काम ठीक से नहीं कर पाता। अब तो हमारा किसी काम पर ध्यान केंद्रित होने का समय कुछ मिनट रह गया है। और यह स्कूल, दफ्तर से लेकर घर तक हो रहा है। पहले मोबाइल-इंटरनेट ही इसके लिए जिम्मेदार होते थे, रही-सही कसर स्मार्टफोन ने पूरी कर दी है।

हाल की एक रिसर्च ने पाया कि बच्चे एक काम पर दो ही मिनट ध्यान लगाते हैं, जबकि बड़े तीन से चार मिनट। इस तरह बार-बार ध्यान भटकाने को ‘कंटीन्युअस पार्शिअल अटेंशन’ कहा गया है। माना जा रहा है कि बिना फोकस किए न्यूटन और आंइसटाइन नहीं बना जा सकता। कई स्कूल और कॉलेजों में जब छात्रों से किसी विषय पर पंद्रह मिनट फोकस करने को कहा गया, तो वे चार-पांच मिनट ही ऐसा कर सके। दरअसल, हम एक काम में लगातार ध्यान लगाने और उसे करने की क्षमता खोते जा रहे हैं। लोग जरूरी से जरूरी काम, फिल्म या नाटक देखते, योग-प्राणायाम-मॉर्निंग वॉक के वक्त भी फोन से दूर नहीं रहते। अफसोस की बात तो यह है कि हम आसपास के लोगों की अपेक्षा फोन पर ज्यादा बातचीत पसंद करने लगे हैं। फोन पर संगीत सुनते हुए भी हमारी उंगलियां चलती रहती हैं या फोन में कुछ खोजती रहती हैं।

इस लेखिका ने मेट्रो में सफर के दौरान लेडीज कोच में अक्सर ऐसा होते देखा है। पहले जब महिलाओं के लिए लेडीज स्पेशल चलती थीं, तो उनमें महिलाएं इतनी अधिक बातें करती थीं कि अगर आंखें बंद कर लो, तो सचमुच ऐसा महसूस होता था कि सैकड़ों चिड़ियां जैसे एक साथ चहक रही हों। मगर मेट्रो के लेडीज कोच में अब निन्यानबे प्रतिशत लड़कियां अपने-अपने फोन पर कुछ न कुछ तलाश करती रहती हैं या किसी से बातें करती रहती हैं। ऐसा लगता है, जैसे एक साथ बैठे या खड़े लोगों में आपसी बातचीत और हेल-मेल का दौर गए जमाने की बात हो गई हो है।

अक्सर बच्चों को किसी भी प्रतियोगी परीक्षा या खेल अथवा कुछ भी मनपसंद करने के लिए फोकस करने को कहा जाता रहा है। लक्ष्य से मत भटको की सलाह दी जाती रही है। पिछले दिनों जिन लोगों ने विभिन्न परीक्षाओं जैसे यूपीएससी़, आईआईटी, नीट आदि में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया, उन सभी ने लगभग एक ही बात कही कि उन्होंने ‘फोकस्ड’ होकर पढ़ाई की तथा वे सोशल मीडिया से दूर रहे। कइयों ने तो यह भी कहा कि उन्होंने इस दौरान अपने मोबाइल का कम से कम उपयोग किया। अक्सर इन बातों को सुनकर अर्जुन के लक्ष्य वाली कहानी याद आती थी। जब अर्जुन को धनुर्विद्या सिखाते वक्त द्रोणाचार्य उससे पूछते हैं, जिस चिड़िया पर उसे तीर का निशाना लगाना है, उसके अलावा उसे और क्या-क्या दिखाई दे रहा है? इस पर अर्जुन यही कहता है कि उसे चिड़िया की आंख के अलावा और कुछ नहीं दिखाई दे रहा। द्रोणाचार्य ने लक्ष्य के प्रति इस कदर समर्पण के लिए अर्जुन की बहुत तारीफ की थी, यही अर्जुन की कामयाबी का राज था। जबकि इससे पहले गुरु के इसी सवाल के जवाब में उनके शिष्य कह चुके थे कि उन्हें तो पेड़ पर चिड़िया के अलावा बहुत कुछ दिख रहा है।

फोकस न होने के कारण ही तो इन दिनों कार चलाते वक्त अथवा सड़क या मेट्रो स्टेशन पर चलने और सेलफोन पर बातें करने के बीच कितने लोग दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं। अगर बातों पर ध्यान है, तो फिर जो कुछ आसपास में हो रहा है, उसका पता या तो चलता ही नहीं, या जब तक चल पाता है, दुर्घटना हो चुकी होती है।

बोल डेस्क [‘हिन्दुस्तान’ में क्षमा शर्मा]

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