राजनीति का नया दौर और वीपी सिंह

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VP Singh
VP Singh

आज जातीय पहचान की राजनीति का बोलबाला राष्ट्रपति के चुनाव तक में देखा जा रहा है लेकिन आरक्षण की बहस को भारतीय राजनीति के केन्द्र में लाने वाले वीपी सिंह भुला दिए गए हैं। उनका एक साल से भी कम का कार्यकाल कई पूर्णकालिक प्रधानमंत्रियों से अधिक अहमियत रखने वाला साबित हुआ। वो गैर-कांग्रेसवाद के जोड़तोड़ वाले राजनीतिक दौर में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे। हालांकि उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने जैसा अहम फैसला लिया, लेकिन इसके बावजूद पिछड़े भी उन्हें अपने मसीहा के तौर पर नहीं देखते।

जातीय पहचान की राजनीति का एक नया दौर शुरू हो चुका है। आरक्षण की समीक्षा करने की बातें कर चुके संघ और बीजेपी इस पर अपने ढंग से दाँव चल रहे हैं। वीपी सिंह का का नाम लेने वाले कम ही हैं, लेकिन उनके रास्ते पर चल सब रहे हैं।

उनके कार्यकाल में भारतीय समाज की छह हजार से ज्यादा जातियों को सिर्फ चार बड़े वर्गों में बांट दिया गया। इनमें अनुसूचित जाति और जनजाति तो पहले से ही थी। लेकिन अब दो और वर्ग इसके साथ जुड़ गए- अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग। आज भारत की पूरी आबादी में हर नागरिक इन चार श्रेणियों में से किसी एक पहचान के साथ है।

इस दौर में भीम राव अंबेडकर का राजनीतिक महत्व हर दल के लिए है लेकिन अंबेडकर को सरकारी तौर पर सम्मानित करने की शुरुआत वीपी सिंह के समय ही शुरू हुई थी। अंबेडकर की संसद के सेंट्रल हॉल में तस्वीर लगाने से लेकर उन्हें भारत रत्न देने तक के फैसले वीपी सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए ही लिए गए थे। अंबेडकर की तरह ही वीपी सिंह भी सामाजिक न्याय के मामले में सकारात्मक कार्रवाई (अफरमेटिव एक्शन) के हिमायती थे। प्रधानमंत्री रहते हुए हावर्ड विश्वविद्यालय में अपने भाषण में भी उन्होंने इसका जिक्र किया। इससे सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को समझा जा सकता है।

मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों का अभिजात्य वर्ग इस कदर नाराज़ हुआ था कि उन्हें सत्ता से बेदखल करने को लेकर दोनों एक हो गए थे। शायद कम लोगों को पता हो कि उन्होंने भूदान आंदोलन में हिस्सा लेते हुए अपनी ज्यादातर जमीन दान में दे दी थी। परिवार वालों ने इसके बाद उनसे नाता तोड़ लिया था। इन सब के बावजूद उन्हें एक विलेन की तरह याद करने वालों की बड़ी संख्या है। उनका विरोध करने वाले अनेक लोग मानते हैं उन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया था। वीपी सिंह के खिलाफ उनके ही समुदाय के चन्द्रशेखर उनके लिए चुनौती बनकर आए थे।

महात्मा गांधी के बाद इस देश में यह बताने की कोशिश की जाती रही है कि कोई भी अपने जाति समूह के हितों से ऊपर उठ कर काम करेगा तो सार्वजनिक जीवन में हाशिए पर चला जाएगा। यह भारतीय लोकतंत्र की वो प्रवृति है जहां से भारत का लोकतंत्र सिर्फ चुनावी तंत्र में तब्दील हो चला है। भारत के सभी राजनीतिक पक्ष इसका ख्याल रखते हैं या रखने को बाध्य हैं। आज जातीय पहचान की राजनीति अक्सर हिन्दुत्व की गोद में बैठी दिखती है, भाजपा को लेकर पिछड़े वर्ग के कई लोगों में जो उत्साह दिखता है वो वीपी सिंह के इरादों से उलट है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़कर सत्ता में आए वीपी सिंह का पूरा करियर बेदाग रहा और सेंट किट्स जैसे आरोप फर्जी साबित हुए। कहा जा सकता है कि वीपी सिंह भारतीय राजनीति में सिद्धांत की राजनीति करने वाली पीढ़ी के आखिरी नेता थे। सामाजिक न्याय के प्रति ईमानदार नज़रिया रखने वाले वीपी सिंह के प्रति यह भारतीय जनमानस का बौद्धिक अन्याय है और उन्हें इतिहास में उनकी उचित जगह देने से वंचित रखा गया है।

ये नियति का अन्याय ही था कि उनकी मौत की कवरेज भी किसी पूर्व प्रधानमंत्री की तरह न हो सकी क्योंकि चैनल 2008 के मुंबई हमलों की रिपोर्टिंग में जुटे थे। जब सामाजिक न्याय की बात होगी तो शायद कभी उनका नाम भी सम्मान के साथ लिया जाएगा।

बोल डेस्क [बीबीसी में तारेंद्र किशोर]

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