नीतीश ने आसान की कोविंद की राह

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Nitish Kumar-Ramnath Kovind
Nitish Kumar-Ramnath Kovind

जैसी कि संभावना थी, बिहार के मुख्यमंत्री व जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। बुधवार को पार्टी विधायकों की मीटिंग में नीतीश ने कहा कि वे सभी कोविंद के लिए वोट करें। नीतीश के इस निर्णय के साथ ही विपक्ष बिखर-सा गया। कांग्रेस ने अंत तक नीतीश को विपक्ष में बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। बदली हुई परिस्थितियों में कांग्रेस क्या निर्णय लेती है और किसे अपना उम्मीदवार बनाती है, यह देखने की बात होगी। उधर कोविंद को लेकर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का क्या रुख रहता है, यह देखना भी दिलचस्प होगा, क्योंकि अब उनके एक तरफ कांग्रेस है तो दूसरी तरफ नीतीश। और इन सबके बीच महागठबंधन सरकार कितनी ‘निर्विघ्न’ रह पाती है, इस पर भी सबकी निगाहें रहेंगी।

बहरहाल, नीतीश के समर्थन के बाद रामनाथ कोविंद की स्थिति और मजबूत हो गई है। अब उन्हें 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिल सकते हैं। यही नहीं, नीतीश की घोषणा के बाद डीएमके भी ‘धर्मसंकट’ में है। कोई आश्चर्य नहीं कि डीएमके समेत कुछ अन्य पार्टियां भी कोविंद को समर्थन दे दें। अगर ऐसा होता है तो एनडीए उम्मीदवार को 70 प्रतिशत तक मत मिल सकते हैं।

ये नीतीश ही थे, जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष को एकजुट करने की पहल की थी। अब जबकि वे एनडीए उम्मीदवार के साथ खड़े हो गए हैं, विपक्षी एकता ताश के पत्तों-सी बिखरती दिख रही है। हालांकि नीतीश कुमार ने कांग्रेस को भरोसा दिलाया है कि उनका निर्णय केवल राष्ट्रपति चुनाव की बाबत है, अन्यथा वे विपक्ष के साथ बने हुए हैं। गौरतलब है कि मंगलवार को उनकी इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद से लंबी चर्चा हुई थी।

गौरतलब है कि नीतीश द्वारा कोविंद को समर्थन देने के दो स्पष्ट कारण हैं। पहला यह कि बतौर राज्यपाल कोविंद ने नीतीश सरकार के लिए कभी कोई मुश्किल पैदा नहीं की। जब शराबबंदी का मामला कानूनी विवादों में आया तब भी वे नीतीश के साथ मजबूती से थे। कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर भी पूर्व के राज्यपालों की तरह उन्होंने कोई नुक्ताचीनी नहीं की थी। दूसरा, यह कि कोविंद का विरोध कर नीतीश किसी भी स्थिति में यह संदेश नहीं दे सकते थे कि वे दलितविरोधी हैं। बिहार में उन्होंने अपनी जो राजनीतिक जमीन तैयार की है, उसमें दलितों-महादलितों की भूमिका छिपी नहीं है।

कुल मिलाकर ये कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर बिहार की राजनीति में खलबली-सी मच गई है। अब बाकी जो हो, फिलहाल तो कोविंद का राष्ट्रपति बनना और उधर मोदी का और इधर नीतीश का फायदे में रहना तय लगता है।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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