दिमाग की पहचान

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Human Brain
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अपने प्रसिद्ध खंडकाव्य आंसू में जयशंकर प्रसाद ने लिखा है – मधुराका मुस्क्याती थी, पहले देखा जब तुमको/ परिचित से जाने कबके तुम लगे उसी क्षण हमको। हालांकि जयशंकर प्रसाद न तो इस तरह का एहसास करने वाले पहले व्यक्ति थे और न ही इस तरह की यह पहली कविता है। यह सभी के साथ होता है कि अचानक ही दिखा कोई नया चेहरा भी ऐसा लगने लगता है, जैसे हम उसे सदियों से जानते हों। अजनबियों की भीड़ में भी कई लोग अपने से लगने लगते हैं, जबकि कुछ लोगों को देखकर पता नहीं क्यों मन यह कहता है कि इनसे दूर रहने में ही भलाई है। अनजान लोगों में अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन का यह फर्क क्या इन लोगों की सूरत में होता है, या हमारे दिमाग में? जैसे यह बात हमें हैरत में डालती है, वैसे ही वैज्ञानिक भी इसे लेकर सिर खुजलाते रहे हैं। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के दो जंतु वैज्ञनिकों ने जब इस पर शोध किया, तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। वे यह जानना चाहते थे कि किसी चेहरे की छवि दिमाग में कैसे अंकित होती है और दिमाग उसे लेकर कैसे धारणा बनाता है। उन्होंने इलेक्ट्रिकल रिकॉर्डिंग करके यह जानने का प्रयास किया कि जब हम किसी चेहरे को देखते हैं, तो हमारे दिमाग के न्यूरॉन पर उसकी क्या और कैसी प्रतिक्रिया होती है।

सबसे पहली चीज, जो उन्हें पता चली कि चेहरे को पहचानने की दिमाग की क्षमता आश्चर्यजनक रूप से तेज होती है। दिमाग किसी भी चेहरे को एक सेकंड के हजारवें भाग में ही पहचान लेता है। यानी उसका मुकाबला किसी भी कंप्यूटर का फेस रिकॉग्निशन सिस्टम नहीं कर सकता। यह प्रयोग सिर्फ मानव पर ही नहीं, बंदरों पर भी किया गया और वहां भी ऐसी ही सफलता मिली। वैज्ञानिकों ने बंदरों को उनके पहचाने हुए लोगों की दो हजार से ज्यादा तस्वीरें समय-समय पर दिखाईं। ये तस्वीरें हूबहू नहीं थीं, बल्कि उनमें कुछ बदलाव कर दिया गया था, ताकि यह जाना जा सके कि चेहरे का कौन सा हिस्सा पहचान का बड़ा कारण बनता है। वैज्ञानिकों ने दिमाग की उन कोशिकाओं का भी पता लगाया है, जो चेहरे को पहचानने का काम करती हैं। उन्हें ‘फेस सेल्स’ कहा गया है। ये कोशिकाएं समूहों में होती हैं और हमारे मस्तिष्क के दोनों ओर ऐसे छह-छह समूह होते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये कोशिकाएं चेहरे की कुछ सतही चीजों को नजरंदाज कर देती हैं। मसलन, कोई आदमी अगर अचानक ही दाढ़ी बढ़ा लेता है, तो उसके नजदीकी दोस्त इस पर ध्यान ही नहीं देते, वे उसे पहले की तरह ही देखते हैं। यह कुछ वैसे ही है, जैसे हिंदी फिल्मों में हीरो जब कई साल गायब रहने के बाद लौटता है, तो उसे भले कोई और न पहचाने, लेकिन घर का कुत्ता जरूर पहचान लेता है। कोशिकाओं की क्षमता असंख्य चेहरों को याद रखने की होती है। जब याद रखे चेहरे-सा कोई दिखता है, तो वह पुराना परिचित जान पड़ता है।

मानव मस्तिष्क की इन क्षमताओं और जटिलताओं की थाह हम तब पा रहे हैं, जब एक तरफ कंप्यूटर के जरिये ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी कृत्रिम बुद्धि को विकसित करते हुए इंसानी दिमाग को ही मात देने की तैयारी चल रही है। पिछले कई अध्ययनों की तरह यह अध्ययन भी बताता है कि इंसानी दिमाग की क्षमता में उससे कहीं ज्यादा गहराई है, जितना कि हमारे कंप्यूटर वैज्ञानिक सोचते हैं। यह बात अलग है कि इन दिनों कृत्रिम बुद्धि की चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही है और इंसानी दिमाग की क्षमता व जटिलता को नजरंदाज किया जा रहा है। हालांकि चर्चा करने वाले भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कंप्यूटरों की इस कृत्रिम बुद्धि को भी आखिर इंसानी दिमाग ने ही बनाया है।

बोल डेस्क [‘पहचान का चेहरा’, हिन्दुस्तान]

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