‘गुनाहों का देवता’ के साथ हम कब तक गुनाह करेंगे?

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Dharamvir Bharati
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हाल के कुछ वर्षों में फिल्मों के पुरस्कार समारोहों में एक नया ट्रेंड चल पड़ा है। सर्वश्रेष्ठ फिल्म या सर्वश्रेष्ठ नायक-नायिका को पुरस्कृत करने के लिए दो अलग-अलग कैटेगरी बनाई जाती है। एक कैटेगरी होती है ‘पॉपुलर अवार्ड’ की जिसमें अमूमन वोटिंग के द्वारा फिल्में चुनी जाती हैं। इसमें वे लोकप्रिय फिल्में होती हैं जो आमलोगों द्वारा बड़े पैमाने पर सराही जाती हैं और बॉक्स ऑफिस पर जिनका प्रदर्शन शानदार होता है। दूसरी कैटेगरी ‘क्रिटिक्स अवार्ड’ की होती है अर्थात् उन फिल्मों की जो ‘फिल्मी दुनिया के बुद्धिजीवियों’ द्वारा चुनी जाती हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो सामान्यतया दोनों कैटेगरी में चुनी गई फिल्में व नायक-नायिका अलग-अलग होते हैं। यहां एक साथ दो प्रश्न उठते हैं  – पहला यह कि लोकप्रिय कही जाने वाली फिल्में आमतौर पर ‘क्रिटिक्स’ को क्यों नहीं भातीं ? और दूसरा इसी से लगा हुआ प्रश्न यह कि ‘क्रिटिक्स’ द्वारा चुनी गई फिल्में कुछ खास उदाहरणों को छोड़कर लोकप्रिय और बॉक्स ऑफिस पर सफल क्यों नहीं हो पातीं ? यहां जिस प्रश्न को मैं उठाने जा रहा हूं कदाचित् यह उसका सरलीकरण (या फिल्मीकरण) लग सकता है लेकिन गहरे जाकर देखें तो उस प्रश्न को समझने में इससे मदद जरूर मिलेगी।

बहरहाल, मेरा प्रश्न है धर्मवीर भारती के पहले उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ और इसके नायक चन्दर को लेकर। क्या कारण है कि हिन्दी की सर्वाधिक पढ़ी और सराही गई कृतियों में से एक इस उपन्यास और इसके नायक पर कभी गंभीर साहित्यिक चर्चा नहीं हुई ? इसके नायक को उसके ‘कैशोर्य’ को लेकर और इस उपन्यास को महज ‘किशोरों का उपन्यास’ कहकर खारिज-सा किया जाता रहा है। जो आलोचक इसे महज ‘किशोरों की चीज’ कहकर अपनी ‘बुजुर्गियत’ जतलाना चाहते हैं, वे वास्तव में इस कृति की ऐतिहासिक महत्ता को नकारने के साथ-साथ अपनी कुंठा का परिचय दे रहे होते हैं। हिन्दी उपन्यास पर लिखे गए शोध-ग्रंथों या आलोचना की पुस्तकों में उपन्यासकार भारती की चर्चा तो जरूर होती है, पर उनकी यह चर्चा मूल रूप से ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ के लिए होती है। पता नहीं लेखक और आलोचक किस मनोग्रंथी के कारण ‘गुनाहों का देवता’ से बचने की कोशिश करते हैं और या तो उसका नामोल्लेख भर करके या उस पर एक-दो पंक्तियां लिखकर आगे बढ़ जाते हैं। उदाहरण के तौर पर रामदरश मिश्र की पुस्तक ‘हिन्दी उपन्यास : एक अंतर्यात्रा’ में ‘गुनाहों का देवता’ का बस नामोल्लेख ही है जबकि ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ को उन्होंने दो पृष्ठ दिए हैं। जिस हिन्दी जगत् में अज्ञेय के ‘शेखर’ को इतना सम्मान और महत्व मिला वहां ‘चन्दर’ की उपेक्षा समझ में नहीं आती।

मैं ‘शेखर : एक जीवनी’ और ‘गुनाहों का देवता’ की तुलना नहीं कर रहा। नि:संदेह ‘शेखर’ हर तरह से अधिक प्रौढ़ कृति है, पर इसका यह अर्थ नहीं कि ‘गुनाहों का देवता’ को इतने हल्के ढंग से लिया जाय। प्रत्येक कृति अपने परिवेश के प्रतिबिम्ब के साथ-साथ समाज की पूरी बनावट की एक तफसील होती है और उससे गुजरे बिना उस युग को समझने का दावा थोथा ही साबित होता है। अज्ञेय के शेखर (‘शेखर : एक जीवनी’) और भुवन (‘नदी के द्वीप’) तथा भारती के चन्दर (‘गुनाहों का देवता’) मूलत: एक ही मिट्टी के बने हैं। चन्दर की चारित्रिक विशेषताएं उसे केवल देवत्व नहीं देतीं, एक मर्यादाबद्ध नादानी के पाश में भी जकड़ती हैं। चरित्रों के बहिरंग विश्लेषण की प्रक्रिया में उसमें गहरा आत्मबोध और सजगता है। चन्दर को गुनाहों का देवता इंगित करना उसके रचनाकार का अपराधबोध ही नहीं, उस पूरे सामाजिक ढ़ांचे से खुला विद्रोह भी है। इन तीनों के व्यक्तित्व में कई ऐसे तत्व हैं जो इन्हें एक धरातल पर ला देते हैं। इसी तरह का साम्य अज्ञेय की शशि (‘शेखर : एक जीवनी’) और रेखा (‘नदी के द्वीप’) तथा भारती की सुधा (‘गुनाहों का देवता’) में है। क्रमश: शेखर, भुवन और चन्दर के व्यक्तित्व-निर्माण में शशि, रेखा और सुधा की भूमिका एक-सी है। अब अगर कोई शशि और रेखा को स्वीकार करे और सुधा को खारिज करे, चन्दर को दरकिनार कर शेखर और भुवन को समझने का दम्भ भरे तो सिवाय हंसने या माथा पीट लेने के क्या किया जा सकता है ?

सच पूछा जाय तो एक ऐतिहासिक संदर्भ में – जब आधुनिकता के निर्माण का उषाकाल था – यह भारती का उद्बोधन है जो आज भी सिर चढ़कर बोल रहा है और जिसे न सुनने के लिए बहुत से लोग ‘गुनाहों का देवता’ के किशोरोचित स्वभाव की आड़ ले रहे हैं। गोया किशोर होना इस जीवन-जगत् से अलग होना है।

क्या कारण है कि लाखों प्रतियों की रिकार्ड बिक्री वाला यह उपन्यास अपनी नवता और मौलिकता को अक्षुण्ण बनाए हुए है और इसके बावजूद यह आलोचकीय उपेक्षा का सर्वाधिक शिकार हुआ है ? सूचना और रंजन की हजारों नई प्रविधियों के बीच भी अपनी जगह बनाए रखने वाले इस उपन्यास (और इसके नायक) में कुछ न कुछ ऐसी बात है जरूर जो एक पड़ाव पर ठहर कर सोचने को विवश करती है और जब तक इससे मुंह मोड़ा जाता रहेगा तब तक इसकी महत्ता घटना सम्भव नहीं बल्कि वह लगातार बढ़ती रहेगी।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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