गैरों पे करम, अपनों पे सितम!

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Nitish Kumar-Narendra Modi
Nitish Kumar-Narendra Modi

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष का साझा उम्मीदवार खड़ा करने और इसके लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से अगुवाई करने का आग्रह करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐन वक्त पर क्या यू-टर्न ले लिया? अब जबकि उनकी सलाह के मुताबिक सोनिया सक्रिय हुई हैं और राष्ट्रपति चुनाव के कुछ ही हफ्ते बचे हैं, नीतीश के एक कदम से विपक्ष की सारी कवायदों की हवा निकलती दिख रही है। जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चाहे जो तर्क दे लें लेकिन ये बात हजम नहीं होती कि शुक्रवार को राष्ट्रपति चुनाव पर चर्चा के लिए सोनिया द्वारा आयोजित अहम भोज में उन्होंने शिरकत नहीं की, लेकिन शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ के सम्मान में दिए गए भोज में वे शामिल हुए। जबकि दोनों ही भोज की जगह दिल्ली थी और एक दिन पहले नीतीश की कोई असामान्य व्यस्तता भी नहीं थी।

गौरतलब है कि सोनिया द्वारा दिए गए भोज में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव  समेत 17 पार्टियों के नेताओं ने भाग लिया, जबकि जेडीयू की ओर से इसमें पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव शामिल हुए। नीतीश ने इस बैठक में अपने शामिल न होने पर सफाई देते हुए कहा कि उनके न जाने का गलत मतलब निकाला गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बैठक में जिन मुद्दों पर चर्चा होनी थी, उन पर वह पिछले महीने ही सोनिया गांधी से मिलकर चर्चा कर चुके थे। ठीक है कि पिछले महीने नीतीश सोनिया से मिले थे, राष्ट्रपति चुनाव की बाबत चर्चा भी हुई थी, लेकिन सोनिया की यह बैठक इस दिशा में अबतक का सबसे बड़ा प्रयास थी और उसमें शामिल न होकर उन्होंने गलत वक्त पर कयासों का बाज़ार गर्म करने का मौका दे दिया, क्या इसे झुठलाया जा सकता है?

वैसे भी लालू से जुड़े ठिकानों पर आयकर विभाग के छापों के बाद लालू-नीतीश के संबंधों में आई तल्खी छिपी नहीं है। इसके बाद लालू के ट्वीट ‘बीजेपी को नए पार्टनर मुबारक हों’ ने भी अटकलों को हवा दी। इससे पहले लालू ने नोटबंदी का जितना खुलकर विरोध किया, नीतीश उतना ही खुलकर उसके समर्थन में सामने आए। बदले में प्रकाशोत्सव पर बिहार आए मोदी ने शराबबंदी पर नीतीश की सराहना की। हाल ही में उन्होंने नीतीश को उनके जन्मदिन पर ट्वीट कर बधाई भी दी। राजनीति के जानकार बताते हैं कि भाजपा जहां जरूरत पड़ने पर नीतीश में अपना स्वाभाविक साथी देख रही है, वहीं नीतीश के लिए यह लालू को हद में रखने की रणनीति है। गौरतलब है कि पिछले दिनों आरजेडी नेताओं द्वारा तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग जोरशोर से उठी थी, जिससे लालू के छिपे एजेंडे के तौर पर देखा गया था। बहराहाल, लालू का एजेंडा चाहे जो हो, नीतीश ने भी अपना एजेंडा छिपाकर नहीं रखा। बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाना, यही तो राजनीति है।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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