रिश्तों पर ‘बेनामी’ संकट

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Lalu Prasad Yadav-Nitish Kumar
Lalu Prasad Yadav-Nitish Kumar

लालू-राबड़ी परिवार के कथित बेनामी संपत्ति-घोटाले से जुड़े लोगों के कई ठिकानों पर मंगलवार को आयकर विभाग के छापे पड़े। आरोपों के मद्देनज़र हुई इस पहली औपचारिक कार्रवाई पर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद का भड़कना स्वाभाविक था।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ अपने ट्वीट में उन्होंने एक ऐसी बात लिख दी जिसका इशारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरफ जाता हुआ लगा। लिखा था ‘बीजेपी को उसका नया एलायंस पार्टनर मुबारक हो।’ इस जुमले पर जब जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) की तरफ से आपत्ति के संकेत मिलने लगे। इसके बाद आरजेडी ने बात बदल दी और कहा, ‘पार्टनर’ से मतलब था आयकर विभाग और सीबीआई। जाहिर है कि यह सफाई किसी के गले नहीं उतरने वाली।

वजह साफ है कि 40 दिनों की चुप्पी के बाद नीतीश कुमार ने इस प्रसंग में जो पहला बयान दिया, उससे लालू खेमे में नाराजगी स्पष्ट देखी गई। नीतीश कुमार ने कहा था कि बीजेपी जो आरोप लगा रही है, उसमें अगर सच्चाई है तो केन्द्र की बीजेपी सरकार अपनी एजेंसियों से जांच या कार्रवाई क्यों नहीं करा रही? इसे केन्द्र सरकार को कार्रवाई के लिए उकसाने जैसा बयान मान कर लालू प्रसाद ने ट्वीट में बीजेपी के पार्टनर वाली बात कह दी हो, यह संभव है। यानी एक तीर से दो शिकार!

नोटबंदी के एलान पर अपने त्वरित बयान में नीतीश कुमार ने जोर देकर कहा था कि प्रधानमंत्री को लगे हाथ बेनामी संपत्ति के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए। उसी समय लगा था कि नीतीश कुमार यहाँ सत्ता साझीदार लालू-परिवार को काबू में रखने के लिए बेनामी संपत्ति को हथियार बनाना चाहते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि बेनामी लेन-देन वाली तमाम गतिविधियों की पूरी जानकारी नीतीश कुमार को बहुत पहले से है। इसलिए वह इस मामले में खुद को एक दूरी पर रख कर लालू प्रसाद के खिलाफ बीजेपी को ही ‘बेनामी डंडा’ लहराने दे रहे हैं।

दरअसल लालू और नीतीश दोनों को पता है कि अगर समय से पहले यहां सत्ता हाथ से गई तो बीजेपी-बढ़त वाली हवा कहीं दोनों की सियासी बुनियाद न हिला दे। यही कारण है कि आरजेडी और जेडीयू एक-दूसरे को संकेतों में आंखें दिखाते हुए भी अपने गठबंधन की ‘चट्टानी एकता’ वाला राग अलापते रहने को विवश हैं। हालांकि यह भी तय है कि अगर कभी पानी सर के ऊपर से गुजरा तो नीतीश कुमार की ‘घर वापसी’ और लालू प्रसाद के सेक्युलर-मिलन के दृश्य नज़र आ सकते हैं।

बेनामी संपत्ति के जाल में लालू-परिवार के फंसने/फंसाने वाले जो भी लक्षण उभरे हों, बिहार में यादव-मुस्लिम जनाधार के वैकल्पिक नेतृत्व की संभावना अभी दूर तक नज़र नहीं आ रही। राज्य की मौजूदा राजनीति के तीन बड़े चेहरों – नीतीश कुमार, लालू यादव और सुशील मोदी का त्रिकोण इस बेनामी संपत्ति वाले प्रकरण का भी केन्द्र बन गया है।

इस बाबत सुशील मोदी पिछले चालीस दिनों से मुहिम चला रहे हैं। उनका दावा है कि लालू-परिवार द्वारा अर्जित हजारों करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति के दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं। उधर लालू प्रसाद अपने परिजनों के नाम पर दर्ज संपत्ति को पूरी तरह वैध तरीके से अर्जित बता रहे हैं। इन दोनों के बीच नीतीश कुमार उस मौके की तलाश या इंतजार में हैं, जब झटकों से कमजोर पड़े लालू उनकी महत्वाकांक्षा के बाधक नहीं, सहायक बनने को विवश होंगे।

इस बीच नीतीश कुमार ने फिर दोहराया है कि वह अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होंगे। लेकिन वह अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को ‘देश का पीएम कैसा हो, नीतीश कुमार जैसा हो’ वाला नारा लगाने से कभी नहीं रोकते। बल्कि एक बार उन्होंने खुद को नरेन्द्र मोदी से बेहतर और अनुभवी बताते हुए प्रकारांतर से अपनी दिली इच्छा जाहिर भी कर दी थी।

फिर अनिच्छा वाले उनके ताजा बयान का ये मतलब भी निकाला जा सकता है कि जनमानस में नरेन्द्र मोदी के विकल्प के रूप में उनका नाम बना रहे। वैसे भी, अपने मुँह से अपनी उम्मीदवारी घोषित करने के बजाय उम्मीदवार नहीं होने का बयान बार-बार देना ज्यादा उपयोगी प्रचार साबित हो सकता है। जो भी हो, आम चर्चा तो यही है कि मुश्किलों से घिरे लालू प्रसाद अब नीतीश कुमार को अधिक पसंद आने लगे हैं।

बोल डेस्क [‘बीबीसी’ में मणिकांत ठाकुर/ ‘आखिर लालू और नीतीश के बीच चल क्या रहा है?’]

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