मंटो से गुजरकर

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Saadat Hasan Manto

मैं उसे लगातार नहीं पढ़ सकती। वह मुझे सन्न छोड़ जाता है। मुझ जैसों को जिन्दा रहना हो, तो उस जैसे से छह-आठ महीने में एक बार मिलना ही ठीक रहता है। इससे ज्यादा मुलाकातें सेहत के लिए खतरा हैं। कभी-कभी लगता है कि काश, मैं उसकी जेनरेशन में पैदा हुई होती, तो उसके घर के सामने खड़ी होकर खूब गालियां बकती।… एक रोज नींद में मैंने उसे खूब आड़े हाथों लिया – ‘सुनो, मुझे चिढ़ है तुमसे। तुम अपने इन पैने नाखूनों को कुतर डालो, जिनसे तुम इस सोसायटी के चेहरे पर पड़ा नकाब नोचते हो। इतना सच कहना जरूरी है क्या? ज़िन्दगी पर कुछ तो यकीन बाकी रहने दो।’ मेरे इस चीखने-चिल्लाने का उस पर कोई असर न हुआ और वह चद्दर ताने सोता रहा। कल रात पारा सौ डिग्री पार कर गया। चुनांचे मैंने आज छुट्टी ले ली। अभी सुबह से उसकी ‘शिकारी औरतें’ पढ़कर उठी हूं। सोचती हूं कि दिन भर वह साथ रहे, तो बुखार क्या बुरा है? वह खुद एक जानलेवा बुखार है। राहत हर्गिज नहीं है वह। दिन भर उसके साथ रहने के बाद कोई किसी करम का बाकी नहीं बचता। अभी मैंने एक क्रॉसिन ली है। उसके बाद भी वह माथे पर 101 डिग्री के ताप से सुलग रहा है।… ऐसी हालत में बस एक ही इलाज नज़र आता है कि चौराहे पर खड़ी होकर एलान करूं – सआदत हसन मंटो, बाबुषा कोहली की सलामी कुबूल करो।

बोल डेस्क [‘जानकी पुल’ में बाबुषा कोहली]

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