क्या ये निर्णायक संकट है?

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Once again Lalu in trouble
Once again Lalu in trouble

चारा घोटाले पर सोमवार को आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला लालू प्रसाद की परेशानियां बढ़ाने वाला है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि इस मामले में दर्ज हर केस के लिए उन पर अलग से मुकदमा चलेगा। इससे पहले झारखंड हाईकोर्ट ने न केवल चारों मामलों में एक साथ मुकदमा चलाने की बात कही थी बल्कि आपराधिक साजिश का आरोप वापस लेने का आदेश भी दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने कानून के स्थापित सिद्धांत की अनदेखी करते हुए लालू प्रसाद को राहत दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने में विलंब को लेकर सीबीआई की भी खिंचाई की और कहा कि एजेंसी अपनी साख बनाए रखने में नाकाम रही।

कोर्ट के इस कड़े फैसले ने राजनीतिक तौर पर अपनी उपस्थिति नए सिरे से महसूस कराने की लालू प्रसाद की कोशिशों पर पानी फेर दिया है। इसमें दो राय नहीं कि तमाम आरोपों, फैसलों और सजाओं के बावजूद लालू प्रसाद ने राजनीति में अपनी हनक काफी हद तक बनाए रखी है। स्वाभाविक रूप से विरोधी खेमे का सबसे ज्यादा ध्यान लालू प्रसाद को उलझाए रखने पर रहता है। अभी जब राष्ट्रपति चुनाव के बहाने विपक्षी राजनीति में एकजुटता की सुगबुगाहट शुरू हो रही थी तो सबकी नजरें लालू प्रसाद की संभावित चालों पर थीं। लेकिन इसी समय उनके खिलाफ एक साथ कई सारे मामले सामने आ गए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो एक बात है, जेल में बंद माफिया डॉन और पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन से उनकी बातचीत का टेप और बेटों के नाम से मॉल बनाने जैसे कुछ और विवादों ने भी उनकी नींद उड़ा रखी है।

चारा घोटाला अगर उनके कथित भ्रष्टाचार को रेखांकित करता है तो मॉल विवाद आम लोगों के बीच घोटाले से हुई उनकी कमाई को लेकर बनी धारणाओं को मजबूती देता है। इन घटनाओं का लालू की दीर्घकालिक राजनीतिक घेरेबंदी से कोई लेना-देना हो या न हो, आरजेडी से नाता तोड़ने पर नीतीश कुमार को समर्थन की पेशकश करके बीजेपी ने अपनी दिली तमन्ना तो जाहिर कर ही दी है। देखना है, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बीजेपी से दूरी बनाने वाले नीतीश इस पेशकश को कितनी तवज्जो देते हैं।

बोल डेस्क [नवभारत टाइम्स के संपादकीय से साभार]

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