इस बार वापस नहीं आएंगे विनोद

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Vinod Khanna
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बकौल सुनील दत्त विनोद खन्ना सा ‘सुदर्शन’ नायक दूसरा कोई नहीं। अभी कुछ दिन पहले उन्हीं विनोद खन्ना की एक तस्वीर मीडिया में वायरल हुई थी जिसमें ‘सुदर्शन’ विनोद अत्यंत जर्जर अवस्था में थे। उस तस्वीर ने बॉलीवुड समेत पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। तब वो मुंबई के सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में भर्ती थे और बताया गया था कि उनके शरीर में पानी की कमी हो गई है। और अब उनके नहीं रहने की ख़बर आई है, साथ में यह जानकारी भी कि वे पिछले दो वर्षों से कैंसर से जूझ रहे थे। 70 वर्षीय विनोद ने गुरुवार सुबह अन्तिम सांस भी रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में ही ली। उनका अन्तिम संस्कार मुंबई के वर्ली श्मशान घाट पर किया गया, जहां उन्हें अंतिम विदाई देने उनके प्रशंसकों के अलावा सिनेमा और राजनीति की कई दिग्गज हस्तियां मौजूद रहीं। मुखाग्नि उनके छोटे बेटे साक्षी खन्ना ने दी। विनोद के दो अन्य बेटे अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना अभिनय के ही क्षेत्र में हैं।

विनोद खन्ना अभिनय के अलावा राजनीति में भी सक्रिय थे और वर्तमान में गुरुदासपुर से भाजपा के सांसद थे। 2002 में वाजपेयी सरकार में वे संस्कृति और पर्यटन मंत्री भी रहे। उनकी मृत्यु पर ट्वीट कर श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, ‘विनोद खन्ना को हम हमेशा एक प्रसिद्ध अभिनेता, समर्पित नेता और बहुत ही अच्छे इंसान के रूप में याद करेंगे। उनके परिवार को इस दुखद घड़ी में मेरी सहानुभूति।‘

विनोद खन्ना ने अभिनय की शुरुआत 1968 में फिल्म ‘मन का मीत’ से की और अपने करियर में 141 फिल्मों में काम किया। ‘मेरे अपने’, ‘मेरा गांव मेरा देश’, ‘अचानक’, ‘इम्तिहान’, ‘इनकार’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘खून पसीना’, ‘लहू के दो रंग’, ‘कुर्बानी’, ‘दयावान’, ‘जुर्म’ जैसी कई फिल्में उनके यादगार अभिनय के लिए याद की जाएंगी। हाल के दिनों में विनोद सलमान खान के पिता की भूमिका में फिल्म ‘दबंग’ में और आखिरी बार शाहरुख खान के पिता की भूमिका में फिल्म ‘दिलवाले’ में नज़र आए थे।

विनोद खन्ना आजीवन जैसे कुछ ढूंढ़ रहे थे। विभाजन के बाद भारत आए एक संपन्न व्यापारी परिवार की संतान होने के बावजूद व्यापार में उनका दिल नहीं लगा। उनकी तलाश कुछ और थी। फिल्मों में वे आए खलनायक के रूप में लेकिन नायकत्व हासिल हासिल करते उन्हें देर नहीं लगी। अमिताभ के शिखर के दिनों में उन्हें किसी ने टक्कर दी थी तो वे विनोद ही थे। इसके बावजूद जाने क्या खोजने 1982 में वे ओशो के आश्रम पहुंच गए। सिनेमा से उन्होंने उस वक्त संन्यास लिया जब उनकी तूती बोल रही थी। खैर, 1987 में वे फिर लौटे। अपना खोया दिन वापस किया, लेकिन अचानक फिर वे सियासत की गलियों में जा पहुंचे। चार बार सांसद रहे, मंत्री भी रहे लेकिन चरित्र भूमिकाओं के जरिये सिनेमा से भी जुड़े रहे। अगर राजनीति में ही उनकी तलाश पूरी हो गई होती तो सिनेमा से आखिर क्यों जुड़े रहते। और सिनेमा से उन्हें सब कुछ मिल गया होता तो उसे छोड़ते ही क्यों। अब एक बार फिर वे कहीं गए हैं। जरूर कुछ ढ़ूंढ़ने ही गए होंगे। लेकिन इस बार वे लौट कर नहीं आएंगे। हां, उस बेचैन आत्मा की तलाश जरूर पूरी हो जाए, ईश्वर से ये प्रार्थना जरूर रहेगी।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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