ईवीएम में नहीं, ‘आप’ अपने भीतर झांकें

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Arvind Kejriwal and other AAP Leaders
Arvind Kejriwal and other AAP Leaders

देश भर में विजय रथ पर सवार भाजपा ने एमसीडी चुनाव में भी शानदार प्रदर्शन का सिलसिला बरकरार रखा और 270 में से 184 सीटों पर जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी। उधर विधानसभा चुनाव में 70 में से 67 सीटें हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी को महज 45 सीटें ही मिलीं और कांग्रेस को 30 सीटों पर संतोष करना पड़ा। वहीं निर्दलीय और अन्य ने 11 सीटों पर जीत दर्ज की।

भाजपा की प्रचंड जीत और उसी अनुपात में आप की हार के बाद पार्टी में व्याप्त असंतोष सतह पर आ गया है। यहां तक कि पार्टी को टूट की आशंका भी सता रही है। बताया जाता है कि आप के कई विधायक अरविन्द केजरीवाल की कार्यप्रणाली से नाराज हैं और पार्टी से अलग राह पकड़ सकते हैं।

बहरहाल, किसी एक चुनावी जीत या हार से किसी भी राजनीतिक दल के भविष्य का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता और यह भी सच है कि एमसीडी चुनावों में आप के साथ कांग्रेस भी बुरी तरह हारी है, लेकिन आप की हार कुछ मायनों में सचमुच अलग है, जिसे केजरीवाल या तो समझ नहीं रहे या फिर समझ कर भी स्वीकार नहीं कर रहे। अपनी हार पर आत्ममंथन की बजाय ईवीएम में गड़बड़ी का जो सुर उन्होंने पकड़ा है, उससे सिवाय अपनी किरकिरी के उन्हें कुछ और हासिल होगा, इसकी संभावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आती।

फरवरी 2015 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली में 54 फीसदी मतों के साथ सरकार बनाकर आम आदमी पार्टी ने सबको आश्चर्य में डाल दिया था। पार्टी की यह जीत उन उम्मीदों और भरोसे की थी, जो दिल्ली वालों ने आप के मुखिया अरविन्द केजरीवाल से लगाई थी। इसीलिए महज दो साल में आप के प्रति जिस तरह की निराशा दिल्ली वालों ने दिखाई है, वह आश्चर्य में डालती तो है, लेकिन वास्तव में इसके कारण बड़े स्पष्ट हैं। न्यूटन के गति के तीसरे नियम की तरह। चलिए समझने की कोशिश करते हैं।

सबसे पहले तो यह कि केन्द्र के साथ अपनी लड़ाई को राजनीतिक मुद्दा बनाकर भाजपा और मोदी को  बात-बात पर घेरने की कोशिश में केजरीवाल यह देख ही नहीं पाए कि इससे सहानुभूति मिलने की बजाय लोगों में उनकी नकारात्मक छवि जा रही है। ‘केन्द्र की सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही’ – उनकी इस शिकायत को लोगों ने गंभीरता से तो नहीं ही लिया, उल्टे यह धारणा बनी कि केजरीवाल दिल्ली में गंभीरता से काम करना ही नहीं चाहते। दूसरे राज्यों में जनाधार बढ़ाने के लिए उनके दौरों ने इस धारणा को और मजबूत किया।

दूसरा, 2015 के जनादेश को लेकर केजरीवाल भारी गलतफहमी के शिकार हुए। इस जनादेश को वे 2014 के लोकसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीतकर आए नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जनादेश मान बैठे। कांग्रेस में निराशा और विपक्ष में बनी शून्यता से उन्हें लगा कि वे मोदी के एकमात्र विकल्प के तौर पर उभर सकते हैं, जबकि सच यह है कि उन्हें मोदी से ही सीख लेनी चाहिए थी। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने पहली बार कोई चुनाव लड़ा। लगातार तीन चुनाव जीतने और खुद को एक कुशल प्रशासक साबित करने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद की ‘मुहिम’ शुरू की। केजरीवाल के लिए बेहतर यह होता कि वह अपना पूरा समय दिल्ली को देकर अपनी योग्यता यहां साबित करते, तब पंजाब, गोवा और गुजरात झांकते। कहने का अर्थ यह कि ‘यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते/ ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि।’

कुल मिलाकर, पहले की कमाई हुई अपनी छवि केजरीवाल ने पिछले दो वर्षों में ‘खर्च’ कर डाले हैं। अब ‘विश्वसनीयता’ और ‘विद्रोह’ के जिस संकट से वे गुजर रहे हैं, उससे उबरने का एकमात्र विकल्प है कि वे दिल्ली के सवालों से जूझें और वायदे के मुताबिक उसकी समस्याओं को हल करें, पूरी निष्ठा और तन्मयता के साथ, बिना भटके, एकनिष्ठ साधक की तरह।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप [हिन्दुस्तान में प्रकाशित निर्मल पाठक के एक आलेख पर आधारित]

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