संतोष का पैमाना

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Mother feeding her child with ice gola
Mother feeding her child with ice gola

गर्मियां आ गई हैं, ग़रीब से ग़रीब शख्स और कुछ नहीं तो गोला गंडा ज़रूर खा सकता है। मुझे इस उपमहाद्वीप के पौने दो सौ करोड़ इंसानों में से कोई एक नाम चाहिए जो ये कह सके कि उसके पास ज़िंदगी में कभी बर्फ़ ख़रीदने की औकात भी नहीं थी। तो क्या वो ये भी कह सकता कि उसने कभी रेलवे स्टेशन या बस टर्मिनल पर चलते कूलर का ठंडा पानी तक नहीं पिया। 200 बरस पहले तक यही पानी ठंडा करने के लिए बर्फ़ नहीं बनती थी, सिर्फ़ पहाड़ों पर पड़ती थी। बादशाह जहाँगीर अपनी शराब में जो बर्फ़ डालते थे, वो सैकड़ों मील परे कश्मीर के पहाड़ों से ख़ास जहाँपनाह के लिए कड़े पहरे में लाई जाती थी और थरमस भी ईजाद नहीं हुआ था।

आज आपको टीबी हो जाए या मलेरिया या सरदर्द। अपने घर से निकलिए, डॉक्टर के पास जाइए और ठीक हो जाइए। डॉक्टर को दिखाने की औकात नहीं है तो केमिस्ट वैसे भी आधा डॉक्टर होता है। और सरकारी अस्पताल और ख़ैराती सफ़ाखाने किसलिए हैं? अब से 70 वर्ष पहले जब एंटीबायटिक नहीं थी तो इन्फ्लुएंजा, प्लेग, गुरारिया, सिफ़लिस से जनता छोड़ दुनिया के सबसे बड़े बादशाह का बचना मोहाल होता था। यकीन नहीं होता तो यूरोप का इतिहास पढ़ लीजिए। कैसे-कैसे ताक़तवर बादशाह इन बीमारियों की चपेट में आकर मिट गए जिनका कि नाम तक नई पीढ़ी ने नहीं सुना।

शाहजहाँ ने ताजमहल तो बना लिया, लेकिन उसमें एयरकंडीशन लगवाना भूल गए। यही हाल दिल्ली के लाल किले और फ़तेहपुर सीकरी के महलों का भी था। अंग्रेज़ आधी दुनिया के मालिक थे, लेकिन महारानी विक्टोरिया से लेकर माउंटबेटन तक किसी के बेडरूम में एसी नहीं था। लेकिन आपके घर, कार, ट्रेन, जहाज़ और दफ़्तर में एसी है। आपमें से किसको ये बात मालूम है कि बहादुरशाह जफ़र को अपने दरबार में दो मुलाज़िम इसलिए रखने पड़ते थे कि वो बादशाह सलामत का पारा काबू में रखने के लिए उन्हें मोरछल की हवा लगाते रहें।

औरंगज़ेब को दिल्ली से दक्कन लाव लश्कर के साथ पहुँचने में तीन महीने लगते थे। आज दिल्ली से अगर कोई सेवन कुमार या अब्दुल्ला अंसारी अपनी मोटरसाइकिल नामक घोड़े को एड़ लगाए तो रास्ते में रुकता-रुकाता भी हफ्ते भर में गोलकुंडा पहुँच जाएगा। ज़्यादा ग़रीब है तो ट्रेन में तत्काल टिकट लेकर बैठ जाए। आज एक आम फ़कीर को भी रात सोने से पहले कहीं न कहीं से खाना मिल जाता है। 70-80 साल पहले बंगाल में ऐसा वक्त भी आया कि लोग एक वक़्त के खाने के लिए बच्चे तक बेचने को तैयार थे। आज कॉटन की जो उतरन शर्ट बाबूराव 100 रुपये की ख़रीदकर पहन लेते हैं, इस कपड़े का अंगरखा बनवाने के लिए 150 वर्ष पहले मिर्ज़ा ग़ालिब को भी खड्डी वाले जुलाहे के यहाँ लड़के को सात बार भेजना पड़ता था।

आज हम जो कुछ भी अपना पैदाइशी हक़ समझकर धौंस जमा रहे हैं, ये सब सुविधाएं हासिल करने की आस में हमारे करोड़ों पुरखे मर मिटे, फिर भी हमारा रोना-धोना है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता, हमारी मांगें ही हैं कि पूरी ही नहीं होती।

बोल डेस्क [बीबीसी में वुसतुल्लाह खान]

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