क्या आप ‘ट्रैप’ हुए?

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Film Trapped
Film Trapped

ट्रैप्ड’, राजकुमार राव के अभिनय और विक्रमादित्य मोटवानी के निर्देशन से सजी ये फिल्म अपने नाम के अनुरूप आपको ट्रैप करने की क्षमता रखती है। आमतौर पर ट्रैप्ड जैसी फिल्में हॉलीवुड में बनती हैं, बॉलीवुड में इस तरह के उदाहरण कम ही हैं। अगर आप लीक से हटकर कुछ देखने की चाह रखते हों, कुछ ऐसा जो सच्चाई और वास्तविकता के बेहद नजदीक हो, तो यह फिल्म आपके लिए बनी है। इससे पहले बड़े स्टार्स के साथ ‘लुटेरा’ बना चुके विक्रमादित्य मोटवानी ने ‘ट्रैप्ड’ से यह साबित कर दिया है कि बड़े बजट और बड़ी स्टारकास्ट के बिना भी बेहतरीन फिल्म बनाई जा सकती है।

फिल्म पर आगे बात करें उससे पहले संक्षेप में इसकी कहानी। फिल्म में शौर्य (राजकुमार राव) और नूरी (गीतांजलि थापा) एक-दूसरे से प्यार करते हैं और उन्हें शादी से पहले एक फ्लैट किराए पर लेना है। बजट ज्यादा न होने के कारण शौर्य शहर से दूर एक खाली अपार्टमेंट की पैंतीसवी मंजिल पर फ्लैट किराए पर ले लेता है। इस अपार्टमेंट में शौर्य के अलावा कोई नहीं है। मेन गेट पर एक बूढ़ा वाचमैन है, जिसे कम सुनाई देता है। बहरहाल, फ्लैट में रात गुजार कर अगले दिन जल्दी-जल्दी बाहर निकलने के वक्त शौर्य को ध्यान आता है कि उसका मोबाइल फ्लैट में ही छूट गया है। मोबाइल की खातिर वह भागकर अंदर जाता है, पर हड़बड़ाहट में चाबी दरवाजे पर ही लगी छोड़ देता है। इतने में हवा के एक तेज झोंके से दरवाजा बंद हो जाता है। फ्लैट में न तो बिजली है, न पानी, न खाना। और तो और अपार्टमेंट की पैंतीसवीं मंजिल पर फंसे शौर्य का मोबाइल भी जवाब दे देता है। कुल मिलाकर, उसके पास निकलने का कोई रास्ता नहीं है। सोचिए, ऐसे में शौर्य क्या करेगा? आप सोचकर भी शायद वो न सोच पाएं जो शौर्य के साथ गुजरा। बस यूं समझिए कि शुरुआती कुछ मिनटों के बाद पूरी फिल्म बस इस फ्लैट से शौर्य के निकल पाने की भीतरी कसससाहट और बाहरी जद्दोजहद की कहानी है – बिना किसी तड़क-भड़क के, कसावट इतनी कि इंटरवल तक की गुंजाइश नहीं।

कहने की जरूरत नहीं कि फिल्म आद्योपांत राजकुमार राव के कंधों पर टिकी है और उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को जिस तरह निभाया है, उससे कलात्मक अभिनय को एक नया आयाम मिलता दिखता है। पल-पल ज़िन्दगी की जंग हारते एक बेबस इंसान के किरदार को उन्होंने जीवंत कर दिया है। भूख से बिलबिलाते शौर्य को कीड़े-मकोड़े खाते देख बस आप हतप्रभ हो जाएंगे। राव की प्रेमिका बनी गीतांजलि थापा के पास करने को कुछ खास था ही नहीं। रही बात निर्देशन की, तो मोटवानी ने दर्शकों को बांधे रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लोकेशन, सिनेमेटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के टेम्परामेंट को पूरी तरह सपोर्ट करते हैं।

कुल मिलाकर यह कि टाइमपास, एक्शन थ्रिलर या रोमांटिक मसाला फिल्मों के शौकीनों के लिए ‘ट्रैप्ड’ में कुछ भी नहीं, फिर भी आपको ये फिल्म एक बार जरूर देखनी चाहिए, फिल्मों में अपनी रुचि का दायरा बढ़ाने की खातिर।

बोल बिहार के लिए रूपम भारती

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