यूपी में योगीयुग का आगाज़

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Yogi Adityanath
Yogi Adityanath

यूपी में आज योगीयुग का विधिवत आगाज़ हो गया। राज्यपाल राम नाईक ने योगी आदित्यनाथ को दो उपमुख्यमंत्रियों – भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के पूर्व मेयर दिनेश शर्मा – और 46 मंत्रियों के साथ यूपी के 21वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, 13 राज्यों के मुख्यमंत्री, 15 केंद्रीय मंत्री और दर्जनों सांसद समेत 70 हजार से ज्यादा लोग लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में आयोजित शपथग्रहण समारोह के गवाह बने। परंपरा और राजनीतिक शिष्टाचार निभाते हुए प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने भी समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज की।

उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत के रूप में राजपूत चेहरा चुनने के बाद ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि यूपी में गैर सवर्ण सीएम चुना जाएगा। एक तर्क यह भी था कि चुनावी जोड़तोड़ की बात अलग है लेकिन सरकार का चेहरा ‘सबका साथ सबका विकास’ वाला होगा। लोगों ने लगभग मान लिया था कि योगी मुख्यमंत्री पद की रेस से बाहर हैं। लेकिन राजनीति का कमाल देखिए, लोग उन्हें जिस वजह से रेस से बाहर देख रहे थे, वही – यानि हिन्दुत्ववादी राजनीति का फायरब्रांड चेहरा होना – उनके पक्ष में गया और यूपी योगी को सौंप दिया गया। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया कि 2019 का चुनाव उसे ‘हिन्दुत्व’ के एजेंडे पर लड़ना है। जातियों में बंटे हिन्दू समाज के ‘हिन्दुत्व’ के नाम पर बडे ध्रुवीकरण को मोदी के मिशन 2019 की ‘जरूरत’ माना गया और योगी इस ‘जरूरत’ के लिए कितने ‘जरूरी’ थे, ये कोई कहने की बात नहीं। अब कोई ओवैसी लाख तंज कस ले कि ‘भाजपा का लॉग इन नेम डेवलपमेंट और पासवर्ड हिन्दुत्व है’, विजय-रथ पर सवार भाजपा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

बहरहाल, 5 जून 1972 को वर्तमान उत्तराखंड के गढ़वाल में जन्मे योगी आदित्यनाथ का मूल नाम अजय सिंह है। उन्होंने 22 साल की उम्र में संन्यास लिया और 26 साल की उम्र में गोरखपुर से सांसद बने। 1998 से 2014 के बीच वे इस सीट से लगातार पांच बार लोकसभा पहुंचे। लव जिहाद और धर्मांतरण जैसे मुद्दों से चर्चा में रहने वाले योगी गोरखपुर मंदिर के महंत भी हैं और पूर्वांचल में उनका अच्छा प्रभाव माना जाता है। इसके अतिरिक्त भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व में पहुंच का भी उन्हें लाभ मिला।

अब जरा बात योगी कैबिनेट की। सबसे पहले उनके दो डिप्टी। केशव प्रसाद मौर्य को जातिगत समीकरणों और प्रमुख पिछड़ा चेहरा होने का लाभ मिला। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उनके नेतृत्व में ही पार्टी ने यूपी की सत्ता में वापसी की है। दूसरे उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को भाजपा के राष्ट्रीय सदस्यता प्रभारी के रूप में पार्टी के सदस्यों की संख्या 1 करोड़ से 11 करोड़ तक पहुंचाने का लाभ मिला। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह दोनों के वे करीबी हैं और पार्टी के ब्राह्मण चेहरे तो वो हैं ही।

वैसे जातिगत समीकरणों की बात करें तो मुख्यमंत्री समेत कुल 49 सदस्यीय मंत्रिमंडल में कुल 17 ओबीसी, 8 ब्राह्मण, 8 कायस्थ-वैश्य, 7 ठाकुर, 6 अनुसूचित जाति और 2 जाट को जगह मिली है। 403 में से एक भी सीट पर किसी मुस्लिम को उम्मीदवारी न देने वाली भाजपा ने मंत्रिमंडल में एक मुस्लिम चेहरे (मोहसिन रजा) को भी रखा है और ओबीसी मंत्रियों में ‘सांकेतिक’ रूप से एक यादव (गिरीश यादव) को जगह मिली है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह का नाम आश्चर्यजनक रूप से मंत्रियों की सूची में नहीं है। हां, लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन अपना स्थान बनाने में जरूर सफल रहे। महिलाओं में कांग्रेस से आईं रीता बहुगुणा जोशी ने कैबिनेट मंत्री के तौर पर तो महज कुछ महीने पहले और वो भी आकस्मिक रूप से राजनीति में आईं स्वाति सिंह ने स्वतंत्र प्रभार वाली राज्य मंत्री के तौर पर अपनी जगह बनाई। बसपा से भाजपा आए स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, ब्रजेश पाठक, लक्ष्मीनारायण चौधरी और अनिल राजभर भी मंत्रीपद से नवाजे गए। मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल रहे सतीश महाना और श्रीकांत शर्मा तो खैर इस सूची में हैं ही।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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