सारे गुलाल केसरिया, मोदीमय हुई होली

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Narendra Modi
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403 में 325 सीटें। उत्तर प्रदेश में कांटे का दिख रहा मुकाबला इस कदर एकतरफा हो जाएगा, ये मोदी-शाह की करिश्माई जोड़ी ने भी सोचा न होगा। भाजपा का बड़े से बड़ा अंधभक्त भी ये कैसे कह सकता  था कि ‘रामलला की लहर’ (221 सीटें) पर भी ‘मोदी-लहर’ (325 सीटें) भारी पड़ेगी और इस कदर भारी पड़ेगी! साइकिल और हाथ का साथ यूपी को नापसंद हो इसमें कोई अचरज की बात न थी लेकिन दो युवा नेताओं की आकर्षक दिख रही और भीड़ जुटा रही जोड़ी को इस कदर नकार दिया जाएगा, सबको पददलित करने का दंभ भरने वाला हाथी उठकर खड़ा भी न हो पाएगा, ये बात सपा, कांग्रेस और बसपा के धुर से धुर विरोधी भी शायद ही हजम कर पाएं!

बहरहाल, इस बार की होली मोदीमय हो गई इसमें कोई दो राय नहीं। राजनीतिक रूप से सबसे बड़े और अहम राज्य यूपी और उससे लगे उत्तराखंड, जहां 70 में 57 सीटें भाजपा को मिली हैं, में सारे गुलाल जिस तरह केसरिया हुए हैं, उसमें कांग्रेस की वो चमक फिलहाल दिख ही नहीं रही जो पंजाब में शानदार वापसी (117 में 77 सीटों के साथ) से उसके चेहरे पर आई है। पंजाब ही क्यों गोवा (40 में 17 सीटें) और मणिपुर (60 में 28 सीटें) में भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आई है (और बहुत संभव है कि सरकार भी बना ले) पर टीआरपी और हैशटैग के जमाने में भाजपा के ठहाके के सामने कांग्रेस की इन मुस्कुराहटों के क्या मोल! बचे केजरीवाल, तो अभी उनकी बात भी क्या की जाय। पंजाब और गोवा में उनके सपनों पर तो जैसे ‘झाड़ू’ ही चल गई।

आश्चर्य तो यह है कि जिस समीकरण को राजनीति की पहली कक्षा में बैठा छात्र भी समझ सकता है वो अखिलेश, राहुल और मायावती को समझ में क्यों न आई? और समझ आई भी तो देर से और आधी-अधूरी, जबकि बिहार के महागठबंधन का ताजा उदाहरण सामने था। समझ आने के बाद अखिलेश और राहुल तो साथ आ गए पर मायावती 110 सीटों पर मुसलमानों को खडा कर अकेले सरकार बना लेने के मुगालते में रहीं। आप खुद देखिए कि करीब 40% वोट हासिल कर भाजपा सवा तीन सौ सीटें ले उड़ी और 23% वोट हासिल कर भी बसपा 20 से भी कम सीटों पर सिमट गई। स्पष्ट है कि विपक्षी वोटों के बंटवारे ने भाजपा की ताकत में बेहिसाब इजाफा कर दिया।

चुनाव के प्रारंभ से परिणाम आने तक भाजपा में कहीं भटकाव न था। जिस समय कांग्रेस अपने ‘तारणहार’ को तलाशने में जुटी थी और यादव परिवार अपने ‘गृहयुद्ध’ में उलझा था, उस समय भाजपा परिवर्तन रैलियों के जरिए पूरे यूपी को मथ रही थी। टिकट बांटने में भी वो भ्रम का शिकार नहीं हुई। उसे पता था कि मुस्लिम वोटों का ‘अनावश्यक’ मोह उसे न घर का छोड़ेगा, न घाट का। तभी तो 403 में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार न होने के बावजूद उसे तनिक भी संकोच न था। तकरीबन 18-20 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम ही क्यों दलितों में दबंग माने जाने वाले 10-12 प्रतिशत जाटवों की ओर भी उसने मुड़कर नहीं देखा और सारा फोकस शेष 70 प्रतिशत वोटों पर रखा और परिणाम सामने है।

ऊँची जातियों का वोटबैंक जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था, अब तो वो वैसे भी कमोबेश भाजपा का हो चुका है। रही ओबीसी की बात तो मोदी स्वयं को समाज के इसी वर्ग से आया बताते हैं और केशव प्रसाद मौर्य भी बतौर प्रदेश अध्यक्ष प्रतीकात्मक रूप से बिठाए जा ही चुके थे। बाकी बचा काम मोदी के ‘मैजिक’ ने कर दिया। इससे इनकार करना कतई ठीक न होगा कि कुछ विरोधाभासों के बावजूद मोदी आम भारतीय जनता की ‘आस्था’ के नए ‘केन्द्र’ बनकर उभरे हैं। 2019 में चाहे जो हो, अभी वो जो कह रहे हैं, समाज का हर तबका (सामाजिक और आर्थिक दोनों) उसे गौर से सुन रहा है और बहुत हद तक मान भी रहा है। नोटबंदी का मुद्दा इस बात का जीता-जागता सबूत है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के परिणाम को अगर हम समझना चाहें तो इस रूप में भी समझ सकते हैं कि एटीएम के आगे लंबी-लंबी लाइनों में लगी जनता ने उन्हें वोटे देने को उससे भी बड़ी लाइन लगा दी। अब बहनजी इसे ईवीएम में गड़बड़ी बताएं तो बताती रहें।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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