सामूहिक बर्बरता का समय

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Devi Prasad Mishra
Devi Prasad Mishra

हिन्दी को उसकी कई मार्मिक और मूल्यवान कविताएं देने वाले देवी प्रसाद मिश्र को कल (22 फरवरी 2017 को) एक बस कंडक्टर और ड्राइवर ने पीटा – बस इसलिए कि उन्होंने कंडक्टर के खुलेआम पेशाब करने पर ऐतराज किया और शिकायत की चेतावनी दी। सामान्य समझदारी कहती है कि ऐसी चीजों को देखकर अनदेखा करना चाहिए। वह भी आँखें मूंदकर आगे बढ़ जाते, तो सुरक्षित रहते। लेकिन इस सामान्य समझदारी का जो कवच हम हमेशा पहने रहते हैं, वह कभी-कभी दरक जाता है। लिखने और बोलने की आदत प्रतिरोध के लिए मजबूर करती है। लेकिन उसका जो नतीजा होता है, वह देवी प्रसाद मिश्र ने कल रात (22 फरवरी 2017 की रात) भुगता। सोशल मीडिया पर आए उनके वीडियो में खौफनाक कुछ भी नहीं है। बस उनकी नाक से निकलता खून जम गया है, बस उनकी आवाज़ आखिरी में कुछ कांपती और नम हो जाती है। यह कोई कविता नहीं, यह हमारे निष्ठुर समय का वह निरा गद्य है, जिसमें संवेदनशीलता अपराध है, प्रतिरोध असहाय व कातर है, और अट्टहास करती एक सामूहिक बर्बरता ही सच है। जिस वक्त रामजस कॉलेज परिसर में कुछ गुंडे पुलिस के मौन संरक्षण में छात्रों और शिक्षकों को पीट रहे थे, उस वक्त पूर्वी दिल्ली के एक हिस्से में एक कवि अपने चेहरे पर घूंसे झेल रहा था। क्या ये दोनों कथाएं आपस में मिलती और कुछ कहती हैं?

बोल डेस्क [प्रियदर्शन की फेसबुक वॉल से साभार]

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