शिव की तपस्थली सिंहेश्वर

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Singheshwar
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एकमात्र शिव हैं जो स्वयं विष पीकर जग को अमृत देते हैं। उनके अलावा कौन है जिसकी पूजा ‘सुर’ ही नहीं ‘असुर’ भी करें। कहना गलत न होगा कि महज बेलपत्र और भांग-धतूरे से प्रसन्न हो जाने वाले शिव ‘सर्वहारा वर्ग’ के एकमात्र देवता हैं। योग परम्परा में शिव को दुनिया का पहला गुरु माना जाता है, जिनसे ज्ञान की उत्पत्ति हुई थी। शिवपुराण की ईशानसंहिता में कहा गया है कि आदिदेव शिव महाशिवरात्रि में करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए थे। इस कथन की व्यावहारिक व्याख्या करें तो हम पाएंगे कि शिव का प्रभाव, उनका आभामंडल सचमुच ऐसा है कि उसमें करोड़ों देव समा जाएं… तभी तो वे देवों के देव हैं… महादेव हैं।

इन्हीं भगवान शिव की पावन तपस्थली है सिंहेश्वर। प्राचीन काल के सोलह महाजनपदों में शीर्षस्थ अंगदेश का अत्यन्त महत्वपूर्ण तीर्थस्थल। अंगदेश, जिसका निर्माण ही स्वयं शिव से जुड़ा हुआ है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार शिव के क्रोध से भष्म यानि अंगहीन होकर कन्दर्प यानि कामदेव ने जहाँ अपना अंग छोड़ा था, वही कालांतर में अंगदेश कहलाया। गौरतलब है कि इस अंगदेश के जिस स्थान पर ‘कन्दर्प-दहन’ हुआ, वही आज के सहरसा का ‘कन्दाहा’ है। बहरहाल, कन्दर्प-दहन के पश्चात् शिव दक्षिण में मन्दराचल और उत्तर में मूजवान पर्वत तक फैले विशाल ‘श्लेषात्मक वन’ में समाधिस्थ हुए। कोसी की कई धाराएं इस वन में बहती थीं। वराहपुराण के उत्तरार्द्ध की एक पुराकथा के अनुसार एक बार शिव को ढूंढ़ते हुए देवराज इंद्र, ब्रह्मा और विष्णु इसी वन में पहुँचे। उस समय शिव हिरण के रूप में विचरण कर रहे थे। हिरणरूपी शिव को पहचानते ही तीनों देवताओं ने सहज कौतूहलवश उन्हें पकड़ने की कोशिश की। इंद्र ने हिरण की सींग का अग्रभाग, ब्रह्मा ने मध्यभाग और विष्णु ने निम्न भाग पकड़ा था। तीनों देवता हिरण को पकड़ने का उपक्रम कर ही रहे थे कि अचानक हिरणरूपी शिव विलुप्त हो गए और सींग तीन भाग में टूटकर विभाजित हो गई। आकाशवाणी हुई कि अब शिव नहीं मिलेंगे। मान्यता है कि विष्णु ने अपने हिस्से आई सींग को लोककल्याण के लिए वहीं स्थापित कर दिया, जिसे आज हम सिंहेश्वर के रूप में जानते हैं।

रामायण काल में इस सिंहेश्वर की पहचान ऋष्य श्रृंग के आश्रम से है, जहाँ पुत्र की कामना लिए राजा दशरथ आए थे। उन्हें कहा गया था कि ऋष्य श्रृंग द्वारा सम्पादित यज्ञ से ही उन्हें पुत्र प्राप्त होगा। ऋषि विभाण्डक के तेजस्वी पुत्र ऋष्य श्रृंग की चिकित्साशास्त्र में भी गहरी पैठ थी। उन्होंने पुत्रेष्ठि यज्ञ में राजा दशरथ के लिए ऐसी औषधि तैयार की कि उसके सेवन से तीनों रानियां गर्भवती हुईं और राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न का जन्म हुआ। सिंहेश्वर के समीप स्थित ‘सतोखर’ गाँव के रूप में उस यज्ञ का प्रमाण आज भी मौजूद है। पुत्रेष्ठि यज्ञ में प्रयुक्त सात हवनकुंडों में से छह हवनकुंड, जो अब तालाब (सप्त पोखर) के रूप में परिवर्तित हो चुके हैं, यहाँ आज भी देखे जा सकते हैं। एक कुंड पास बहने वाली कोसी की धारा में विलीन हो चुका है। इन हवन कुंडों को खोदने पर राख की मोटी परत निकली है, जो अतीत में सम्पादित किसी महान यज्ञ को निर्दिष्ट करती है। अत: ये विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि ये हवन कुंड महान चिकित्साशास्त्री ऋष्य श्रृंग की यज्ञशाला या प्रयोगशाला रहे होंगे।

अब जरा महाभारतकाल में सिंहेश्वर को देखें। महाभारत में वर्णित कौशिकी तीर्थों में एक तीर्थ है चम्पारण्य। इस तीर्थ से मिलने वाले पुण्य के लिए कहा गया है कि यहाँ एक रात्रि के निवासमात्र से सहस्त्र गायों के दान का फल मिलता है। कौशिकी तीर्थों में ही ‘वीराश्रम’ और ‘कुमारतीर्थ’ भी हैं, जो चम्पारण्य तीर्थ की उत्तर और पूर्व सीमा पर अवस्थित वर्तमान ‘वीरपुर’ और ‘कुमारखण्ड’ को रेखांकित करते हैं। इस तरह इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि वर्तमान सिंहेश्वर स्थान ही महाभारत में वर्णित चम्पारण्य तीर्थ है। वैसे इस तथ्य की अतिरिक्त पुष्टि के लिए भी ध्यातव्य है कि तत्कालीन अंगनरेश के अधीन आने वाले इस क्षेत्र को चम्पक के बागों से परिवृत्त होने के कारण चम्पारण्य कहा गया था। चम्पावाती देवी इस चम्पारण्य की अधिष्ठात्री देवी थीं। इस आलोक में देखें तो आज भी इस इलाके के अधिकांश गांवों में ‘चम्पादेवी’ की पूजा होती है। शंकरपुर और निसिहरपुर में तो बकायदा ‘चम्पादेवी’ की मूर्ति स्थापित है। यही नहीं, ‘चम्पावती’ यहाँ की बांतर जाति की मान्य कुलदेवी भी  हैं और बांतर सहित कई अन्य जातियों के मुँह से आज भी ‘चम्पावती’ के भगैत आसानी से सुने जा सकते हैं।

सिंहेश्वर के पौराणिक व दार्शनिक महत्व को रेखांकित करने वाले कई प्रसंग हैं, जिनका विस्तृत वर्णन यहाँ संभव नहीं। पर महाभारत के ही एक और प्रसंग की चर्चा से स्वयं को रोक नहीं पा रहा। महाभारत के अनुसार ऋषियों एवं राजाओं का एक दल प्रभास तीर्थ से यात्रा आरंभ करके कौशिकी तीर्थ, जिसमें तत्कालीन चम्पारण्य यानि आज का सिंहेश्वर स्थान सम्मिलित है, आया था। इस दल में भृगु, वशिष्ठ, गालव, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, यमदग्नि, अष्टक, भरद्वाज, और वालखिल्य जैसे ऋषि एवं शिवि, दिलीप, नहुष और अम्बरीष जैसे राजा थे। सोचिए कि कैसी ख्याति रही है इस क्षेत्र की कि ऐसी विभूतियां भी यहाँ आकर स्वयं को धन्य मानती थीं।

चलते-चलते

ये देवाधिदेव भगवान शिव की असीम कृपा ही थी कि उनके स्थान ‘सिंहेश्वर’ का प्रतिनिधित्व मैंने लगातार दो बार (1981 से 1989 तक) विधायक के रूप में किया और 1989 मे जब मधेपुरा से सांसद चुना गया तब भी सिंहेश्वर मेरे लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा रहा। यही नहीं, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति के तौर पर भी यह पवित्र स्थान मेरे कार्यक्षेत्र में रहा। इस तरह न केवल मेरी आस्था बल्कि मेरे कर्म की परिभाषा भी सिंहेश्वर के बिना अधूरी है। पर सिंहेश्वर की चर्चा से होने वाली गौरवानुभूति के साथ ही एक टीस भी भीतर उठती है कि हमारे अद्वितीय अतीत के इतने गौरवशाली पन्नों को अपने में समेटे होने के बावजूद पर्यटन के राष्ट्रीय मानचित्र पर अभी तक इसकी जगह नहीं बन पाई है! अंत में एक बात और, उपर्युक्त चर्चा के लिए स्वनामधन्य साहित्यकार श्री हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ को साधुवाद देना चाहूँगा, जिनकी पुस्तक ‘शैव अवधारणा और सिंहेश्वर स्थान’ से मुझे कई महत्वपूर्ण तथ्य मिले।

महाशिवरात्रि पर ‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. रवि, पूर्व सांसद एवं संस्थापक कुलपति, बीएनएमयू, बिहार

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