पाकिस्तान में वेलेंटाइन डे

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Valentine's Day in Pakistan

कैलेंडर के 365 दिनों में एक बेचारा 14 फरवरी का वेलेंटाइन डे चंद दकियानूस लोगों को नागवार गुजरता है। इस बार तो इतना नागवार गुजरा कि मामला इस्लामाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा और कोर्ट ने भी गैर-इस्लामिक और अनैतिकता, अश्लीलता और नग्नता बताने वाली एक निजी याचिका को आधार बनाकर इस पर प्रतिबंध का फैसला सुना दिया। सूचना-प्रसारण मंत्रालय के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी और टेली कम्युनिकेशन अथॉरिटी को मीडिया में इससे संबंधित प्रचार-प्रसार रोकने को कहा। साथ ही इस्लामाबाद के कमिश्नर को ऐसे किसी सार्वजनिक कार्यक्रम पर रोक लगाने का आदेश दिया। इसके बाद प्रशासन ने शहर के होटलों क्लबों में ऐसे आयोजनों को पहले से जारी अनुमति आनन-फानन रद्द कर दी। इनके अलावा फूल-गुब्बारे-ग्रीटिंग कार्ड जैसी चीजों से रोजी कमाने वालों की उम्मीदें भी बुरी तरह प्रभावित हुईं।

अब कानूनी हलकों में इस बात पर खुली बहस की जरूरत आ पड़ी है कि क्या किसी अदालत को ऐसे फैसले देने चाहिएं, जो अनावश्यक रूप से सख्त और इंसानी व्यवहार पर प्रतिबंध थोपने वाले हों और समाज इन्हें नुकसानदेह न मानता हो? उस समाज में खासकर, जहां प्यार से ज्यादा घृणा के माहौल से लड़ने की जरूरत है। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से समाज में ऐसे बंद दिमाग लोग दिखाई पड़ने लगे हैं, जिनका काम मोरल पुलिसिंग करना रह गया है। अदालत का यह फैसला इस पुलिसिंग को ही बढ़ावा देगा। एक बात और रेखांकित होनी चाहिए कि किसी एक शख्स की व्यक्तिगत सोच के आधार पर नैतिकता का निर्धारण करने वाली ऐसी याचिका पर ऐसा फैसला कितना उचित है? क्या यह उन प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाला नहीं है, जो ऐसे मामलों को पूरे देश को प्रभावित करने वाली सेंसरशिप के रूप में ले सकती है?

भला हो समाज के इन संकीर्णतावादी तत्वों का, जिनकी हरकतों से आज पाकिस्तान का विश्व मीडिया में मखौल उड़ रहा है। क्या ऐसे वक्त में, जब पाकिस्तान को अपनी छवि और बेहतर बनानी है, इस तरह की सोच और ऐसे मामले इसकी नकारात्मक छवि को नहीं उभारेंगे?

बोल डेस्क [‘द डॉन’, पाकिस्तान से साभार, सौजन्य ‘हिन्दुस्तान’]

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