सुरेन्द्र वर्मा को व्यास सम्मान

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Surendra Verma
Surendra Verma

वर्ष 2016 का व्यास सम्मान हिन्दी के वरिष्ठ उपन्यासकार व नाटककार सुरेन्द्र वर्मा को दिया जाएगा। उन्हें यह पुरस्कार उनके चर्चित उपन्यास ‘काटना शमी का वृक्ष : पद्मपंखुरी की धार से’ के लिए मिलेगा। बता दें कि केके बिड़ला फाउंडेशन का साढ़े तीन सम्मानराशि वाला यह पुरस्कार दस वर्ष की अवधि में किसी भारतीय नागरिक की हिन्दी में प्रकाशित एक उत्कृष्ट कृति पर दिया जाता है। सुरेन्द्र वर्मा का यह उपन्यास वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ और पाठकों और समीक्षकों ने इसे हाथोंहाथ लिया। कहना गलत न होगा कि महज 7 वर्ष में इस कृति ने ‘क्लासिक’ का दर्जा पा लिया है।

‘काटना शमी का वृक्ष : पद्मपंखुरी की धार से’ में सुरेन्द्र वर्मा ने कालिदासयुगीन भारत को जीवंत कर दिया है। उनके लिए कालिदास मनुष्यता और उसकी भारतीय व्याख्या के सबसे समर्थ प्रतिनिधि हैं। इस उपन्यास में कालिदास के बहाने एक ओर साधारण जनता की सरलता और भोलेपन का तो दूसरी ओर नागरिक जीवन के विलास और कुचक्र का सजीव चित्रण है। वहीं उपन्यास के तीसरे कोण पर सत्ता का घात-प्रतिघात और संस्थानों की जड़ता है जिसे उपन्यासकार ने बड़ी संजीदगी से उजागर किया है। कालिदासकालीन भारत को मथने वाले प्रश्न हों या उनमें निहित विडंबनाएं  और संभावनाएं, अपने पूरे वेग, पूरी कसमसाहट के साथ इस उपन्यास में मौजूद हैं।

सुरेन्द्र वर्मा की कृतियों की एक बड़ी खासियत है उनमें दृश्य, काव्य और कथा का समन्वय, जिसे इस उपन्यास में आप आद्योपांत पाएंगे। इसमें उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों के साथ ही नाट्य व सिनेमाई युक्तियों और तकनीकों का अत्यंत बारीक संयोजन किया है। अतीत और वर्तमान की जैसी मिलीजुली चहलकदमी पूरे उपन्यास में है, वह सुरेन्द्र वर्मा के ही बूते की बात थी।

बहरहाल, सुरेन्द्र वर्मा का जन्म 7 सितंबर 1941 को झांसी में हुआ था। ‘अंधेरे से परे’, ‘मुझे चांद चाहिए’ और ‘दो मुर्दों का गुलदस्ता’ उनके अन्य चर्चित उपन्यास हैं। वहीं उनके लिखे नाटकों – ‘सूर्य के अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’, ‘आठवां सर्ग’ और ‘कैद ए हयात’ की रंगमंच की दुनिया में अपनी एक अलग प्रतिष्ठा है। अपने साहित्यिक अवदान के लिए वे संगीत नाटक अकादमी, भारतीय भाषा परिषद और साहित्य अकादमी द्वारा पहले ही सम्मानित हो चुके हैं।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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