स्वयं राम रखते थे उनकी भूख की ख़बर

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Swami Vivekananda
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स्वामी विवेकानंद का नाम से कौन परिचित नहीं है। कोई उन्हें महाज्ञानी कहता है तो कोई अप्रतिम दार्शनिक। किसी के लिए वो जीवन-आदर्श हैं तो किसी के लिए स्वयं भगवान के स्वरूप। जो भी हो, स्वामी विवेकानंद का ईश्वरीय सत्ता से कुछ तो संबंध था, तभी तो स्वयं विष्णु के अवतार माने जाने वाले रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें अपने आध्यात्मिक शिष्य के तौर पर स्वीकार किया था। पर विवेकानंद और ईश्वर का संबंध बस यहीं तक सीमित नहीं था। ऐसा कहा जाता है कि त्रेता युग के विष्णु अवतार भगवान राम स्वयं उन्हें भोजन खिलाने आते थे।

देखा जाय तो भगवान राम दुनिया के हर इंसान का पेट भरते हैं, वही पालनहार हैं, लेकिन विवेकानंद के साथ एक घटित एक घटना सचमुच अद्भुत है। बात तब की है जब संन्यासी विवेकानंद भूखे-प्यासे भटक रहे थे। उनकी जेब में एक भी पैसा नहीं था और वह अपनी हर जरूरत के लिए भगवान पर ही आश्रित थे। बहुत दिनों से उन्होंने कुछ खाया तक नहीं था। ऐसे में एक दिन वे तारी घाट रेलवे स्टेशन पर बैठे थे। तभी भौतिक मानसिकता से ग्रसित एक व्यवसायी उनके समीप आकर बैठा और उनके सामने अपने खाने का डिब्बा खोल दिया। वह व्यवसायी सिर्फ ऐश और आराम की ज़िन्दगी जीने में विश्वास करता था और किसी भी रूप में संन्यास जैसी बात को नहीं मानता था।

उस अहंकारी व्यवसायी ने विवेकानंद से कहा – “देखो मेरे पास खाने के लिए स्वादिष्ट भोजन है और तुम्हें सूखे गले और खाली पेट ही गुजारा करना पड़ रहा है।” पर विवेकानंद ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और शांत भाव से बैठे रहे। इतने में अचानक एक अजनबी व्यक्ति भोजन और पानी लेकर स्वामी विवेकानंद के पास आया और उनसे भोजन ग्रहण करने की प्रार्थना करने लगा। उसने बताया कि रात को उसके स्वप्न में स्वयं भगवान राम आए थे और उन्होंने ही तारी घाट स्टेशन पर बैठे संन्यासी को भोजन कराने का आदेश दिया है। यह सुनते ही स्वामीजी की आंखें भर आईं और उन्होंने बड़े प्रेम से उस भोजन को स्वीकार किया।

यह घटना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भगवान कभी अपने भक्तों और अपनी शरण में आए लोगों को कष्ट में नहीं रहने देते। अगर आप वाकई ईश्वर से प्रेम करते हैं, उनके प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हैं तो वे निश्चित रूप से आपकी सहायता के लिए पहुँचेंगे। ईश्वर पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति को कभी अपने भोजन, वस्त्र या आश्रय की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। उनकी हर जरूरत उस ‘जगतनियंता’ की जिम्मेदारी हो जाती है।

बोल डेस्क [‘नवभारत टाइम्स’ में छपे एक आलेख पर आधारित]

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