पाक की जरूरत हैं ‘रईस’ और ‘काबिल’

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Film Raees and Kaabil
Film Raees and Kaabil

पाकिस्तान में बॉलीवुड फिल्मों को लेकर नई नीति लाई गई है जिसके तहत बॉलीवुड फिल्मों की रिलीज से पहले सूचना मंत्रालय और सेंसर बोर्ड से फिल्म की समीक्षा करानी होगी। दोनों जगहों से फिल्म के पास होने के बाद ही उसे पाकिस्तान में रिलीज किया जा सकेगा। गौरतलब है कि उरी हमले के बाद दोनों देशों के बीच शुरू हुए तनाव के बाद पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों की रिलीज पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। अब चार महीने के बाद इस नई नीति के तहत शाहरुख खान की रईस और रितिक रोशन की काबिल को पाकिस्तान में रिलीज के लिए हरी झंडी दी गई है। पेश है इस संदर्भ में पाकिस्तान के द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में प्रकाशित आलेख जिसे दैनिक हिन्दुस्तान ने फिर भारतीय सिनेमा शीर्षक से प्रकाशित किया है…

सुखद है कि हाल के वर्षों में सोच बदली है और लोग, खासकर महिलाएं सिनेमाघरों में जाने लगी हैं। सिनेमा मालिकों ने मल्टीप्लेक्सों में पैसा लगाकर जो जुआ खेला था, वह भी मुनाफा देने लगा है। आज ज्यादातर बड़े शहरों में एक से ज्यादा मल्टीप्लेक्स हैं और निवेशक अब दूसरे दर्जे के छोटे शहरों-कस्बों की ओर देख रहे हैं। ये मल्टीप्लेक्स इसलिए फायदे में नहीं हैं कि ये पश्चिम का सिनेमा दिखाते हैं, बल्कि इसलिए मुनाफे में हैं कि ये वह दिखा रहे हैं, जो पब्लिक देखना चाह रही है। यहाँ नाच-गानों से भरपूर मनोरंजन वाली भारतीय फिल्मों की जबरदस्त मांग है और बड़े मुनाफे का जरिया भी। हाल में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर लगे तथाकथित प्रतिबंध ने पाकिस्तानी फिल्म उद्योग की आत्मनिर्भरता की पोल खोल दी। दर्शक अचानक घटने लगे। जहां-जहां देशी फिल्में लगीं, दर्शक नहीं आए या बहुत कम आए। मुनाफा तो दूर, सिनेमा घाटे का सौदा बन गया। ऐसे में, भारतीय फिल्में फिर से दिखाने का फैसला स्वागतयोग्य है। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी इसका समर्थन किया है। सही है कि भारतीय फिल्मों को सेंसर बोर्ड से क्लियरेंस लेना पड़ रहा है, लेकिन इसमें कुछ भी नया नहीं है। दरअसल, हालिया प्रतिबंध के पीछे भारत के साथ बढ़ा तनाव और तथाकथित राष्ट्रवाद का उभार था। दुर्भाग्य से यह राष्ट्रवादी उभार बॉक्स ऑफिस के लिए अच्छा नहीं है। सिनेमा हॉलों की खाली सीटें और बिन बिके रह गए पॉपकॉर्न के ढेर पाकिस्तानी फिल्म उद्योग को सतर्क करने के लिए काफी थे। लोग सिनेमा तभी देखेंगे न, जब वह उसकी मनोरंजन की भूख शांत करेगा। अब यह यहां के फिल्म-निर्माताओं और निर्देशकों पर है कि वे कैसी फिल्में बनाते व दिखाते हैं। इसके लिए उन्हें स्थानीय फिल्म निर्माताओं को प्रोत्साहन देना होगा। उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तानी दर्शक अब ज्यादा पैसा देकर भी सिनेमा देखने जा रहा है, लेकिन अपनी शर्तों के साथ। देश में फिल्म प्रतिभाओं की कमी नहीं है, पर वे तभी पनप पाएंगी, जब उन्हें अनुकूल माहौल मिलेगा। वह दिन दूर नहीं, जब बाहर से आने वाली, खासतौर से भारतीय फिल्में हमारे मनोरंजन उद्योग को किनारे लगा देंगी।

बोल डेस्क [‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’, पाकिस्तान एवं ‘हिन्दुस्तान’ से साभार]

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