हमसे ही बनता है ‘टैक्स को न मानने वाला’ समाज

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People of India
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भारत के वित्तमंत्री ने साल 2017-18 का बजट पेश कर दिया। जैसा कि हर साल होता है, बजट से कुछ लोग ‘नाराज’ हैं तो कुछ इससे ‘संतुष्ट’ दिख रहे हैं। होना तो नहीं चाहिए, लेकिन होता यही है कि केन्द्र में जो सरकार होती है उसके समर्थक चाहे उन्हें बजट की समझ हो या नहीं, बजट आते ही उसे ‘संतुलित’ बताने में जुट जाते हैं और वो सचमुच संतुलित ही क्यों न हो, विपक्ष में बैठे लोग उसका विरोध करना अपना धर्म समझते हैं। जब से होश संभाला है, यही देखता आया हूँ। ऐसे में अगर इस साल भी ऐसा हो रहा है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। सरकार सारे राज्यों और समाज के सभी वर्गों को खुश कर देगी और लगे हाथ नोटबंदी की चोट पर मरहम भी लगा देगी, ऐसी उम्मीद थी भी नहीं और ऐसा हुआ भी नहीं।

बहरहाल, इस बार के बजट भाषण में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कुछ ऐसे सवाल जरूर उठाए हैं, जो अत्यंत गंभीर हैं और उन पर समस्त देशवासियों को बड़ी गंभीरता से मनन करना चाहिए। किसी भी तरह के पूर्वाग्रह और राजनीति से ऊपर उठकर। अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री ने बताया कि पिछले 5 सालों में देश में 1.25 करोड़ से ज्यादा कारें बिकीं और अकेले 2015 में 2 करोड़ लोगों ने विदेश यात्राएं कीं। लेकिन देश में सिर्फ 20 लाख लोग ऐसे हैं जो नौकरी नहीं करते पर 5 लाख से ज्यादा कमाते हैं।

ऐसे में वित्तमंत्री ने गलत क्या कहा कि हमारा समाज मुख्यत: टैक्स को न मानने वाला समाज है? सरकारी आंकड़े चीख-चीख कर इसकी गवाही दे रहे हैं। जरा सोचकर देखिए, सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में सिर्फ 76 लाख लोग ऐसे हैं जिनकी आमदनी 5 लाख से ज्यादा है और उनमें से 56 लाख सैलरी पाने वाले हैं यानि वे नौकरी करते हैं और चाहकर भी अपनी आय छिपा नहीं सकते।

आंकड़ों के मुताबिक देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की कुल संख्या 3.7 करोड़ और टैक्स देने वालों की संख्या 2.7 करोड़ ही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि 2.7 करोड़ करदाताओं के कंधों पर सवा अरब से ज्यादा आबादी का बोझ है। क्या इस स्थिति के लिए भी हम सरकार को ही जिम्मेदार मानेंगे? अगर मुट्ठी भर लोगों को कोई जायज बात बतानी हो तो सरकार सख्ती कर भी ले, पर इनकम टैक्स के मामले में ये तकरीबन नामुमकिन है। दुनिया की किसी भी सरकार के पास इतनी ताकत नहीं है कि वह सभी आम नागरिकों पर सख्ती कर सके। करचोरी तभी रुक सकती है जब हम चाहेंगे। ये पूरी तरह व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है।

सच तो यह है कि जिसे हम कालाधन कहते हैं उसमें कहीं-न-कहीं हम सबका अप्रत्यक्ष योगदान होता है। हम जिस दिन व्हाइट मनी को तरजीह देना शुरू कर देंगे, कालेधन के कारोबारियों को सुधरते देर नहीं लगेगी। देश की अर्थव्यवस्था में हम ईमानदारी से बस अपना हिस्सा भर अदा कर दें, देश का टैक्स बेस तुरत बढ़कर 8 करोड़ लोगों का हो जाएगा। जरा सोचिए, जब हमारा टैक्स बेस चार गुना बढ़ जाएगा तब क्या देश की तरक्की भी दिन दूनी रात चौगुनी नहीं हो जाएगी?

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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