पद्मावती : ऐतिहासिक या काल्पनिक

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Film Padmavati Controversy
Film Padmavati Controversy

संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म ‘पद्मावती’ को ऐतिहासिक बताया है और यही उनकी समस्या है। अगर आप यह कहें कि यह हिस्ट्री नहीं फिक्शन है, तो किसी को कोई ऐतराज न हो। सारी समस्या ही तब खड़ी होती है, जब आप इसे इतिहास के रूप में पेश करते हैं। प्राय: फिल्म को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए ऐसा किया जाता है। इसके बाद जो दिल चाहता है, उसे दिखा देते हैं। इनके पास क्रिएटिव लाइसेंस भी होता है। यहाँ यही विरोधाभास है। पद्मावती का जो पूरा किस्सा है, वह इतिहास है ही नहीं। अलाउद्दीन के जमाने में पद्मावती का कोई जिक्र ही नहीं है। 16वीं शताब्दी में हिन्दी महाकाव्य ‘पद्मावत’ में मलिक मुहम्मद जायसी ने इस किरदार को जिन्दा किया। यह सही है कि हिन्दी साहित्य में पद्मावती की जगह है और साहित्य भी इतिहास का एक पार्ट होता है, लेकिन इतिहास की किताब में पद्मावती की कोई जगह नहीं है। मेरा शोध 14वीं और 16वीं शताब्दी पर है, इसलिए मैं भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि पद्मावती एक काल्पनिक किरदार है। अलाउद्दीन खिलजी का जो चित्तौड़ से मुकाबला है, उसमें कहीं भी पद्मावती को कोई जिक्र नहीं मिलता है। पद्मावती वाचिक परंपरा की उपज है और इसका प्रभाव किताबों से कहीं ज्यादा होता है। लेकिन जायसी ने जैसा दिखाया है, उसे आप इतिहास कहें, तो यह गलत होगा।

बोल डेस्क [बीबीसी में इतिहासकार नजफ हैदर]

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