क्यों है हमारी जीवन-यात्रा?

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Journey of Life
Journey of Life

अक्सर हमारी पूरी उम्र गुजर जाती है और हम यह तय ही नहीं कर पाते कि हम यहाँ हैं क्यों? इससे हमारी जीवन की गुणवत्ता दोयम दर्जे की हो जाती है। गुणवत्ता सुधारनी है, तो हमें पहले-पहल बस इतना करना चाहिए कि इसका उद्देश्य तय करें। इतने भर से जीवन में आमूल-चूल बदलाव आ सकता है। पैसा, करियर आदि चीजों से हटकर बस इतना ठान लें कि कुछ ऐसा कर गुजरेंगे कि उसके पूरा होने के बाद शांति और तसल्ली के साथ मर पाएं, तो समझिए जीवन यात्रा ठीक होगी।

शांति और तसल्ली के लिए यह जरूरी नहीं कि आप कोई बड़ा काम ही करें। यह आपके दैनंदिन के काम भी हो सकते हैं। छोटा से छोटा काम भी, जो आपको सुकून दे। रवीन्द्रनाथ टैगोर इस बिंदु पर दार्शनिक भाव से कहते हैं कि मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन को समय के किनारे पड़ी हुई ओस की भांति हल्के-हल्के नाचने दे। यह नाच तभी हो सकता है, जब आपका मन ओस की तरह हल्का हो। कर्म, विचार निर्मल हों। उनमें दूसरों के लिए जगह हो। बर्तोल्त ब्रेख्त अपनी कविता में कहते हैं – तुम्हारा उद्देश्य यह न हो कि तुम एक बेहतर इंसान बनो, बल्कि यह हो कि तुम एक बेहतर समाज से विदा लो।

सफल होना ही हर स्थिति में जरूरी नहीं। नाविक लौरेन्स को याद करें। ओलंपिक में नौका रेस के मुकाबले के दौरान वह एकाएक अपने घायल प्रतियोगी की मदद के लिए रुक गए। नतीजा यह हुआ कि वह रेस में सबसे पीछे रहे। लेकिन चूंकि उन्होंने जीतने की इच्छा से अधिक दूसरे के जीवन को महत्व दिया, इसलिए उनके लिए सबसे अधिक तालियां बजीं। उन्होंने वह हासिल कर लिया, जो जीतने वालों के लिए एक सपना होता है।

बोल डेस्क [साभार हिन्दुस्तान, नीरज कुमार तिवारी का आलेख जीवन क्यों’]

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