‘यही तो बचा है, इसे भी ले लोगी?’

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Khan Abdul Gaffar Khan
Khan Abdul Gaffar Khan

खान अब्दुल गफ्फार खान। सीमांत गांधी। लाल कुर्ती वाले। बलूच बंटवारे से दुखी थे। वह भारत के साथ रहना चाहते थे, लेकिन भूगोल ने उन्हें मारा। बापू के सच्चे अनुयायी सीमांत जब आखिरी बार मिले, तो बापू ने उनसे कहा – अब भारत का मोह त्याग दो, अपने देश की सेवा करो। यह अंदाजा लगाना आसान नहीं है कि क्या गुजरा होगा दोनों के दिल पर। वही सीमांत गांधी पाकिस्तान में ताउम्र कैद रहे।

साल 1969 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विशेष आग्रह पर वह इलाज के लिए भारत आए, तो हवाई अड्डे पर उन्हें लेने श्रीमति गांधी और जेपी (जयप्रकाश नारायण) गए। खान जब हवाई जहाज से बाहर आए, तो उनके हाथ में एक गठरी थी, जिसमें उनका कुरता-पाजामा था। मिलते ही श्रीमति गांधी ने हाथ बढ़ाया उनकी गठरी की तरफ – इसे हमें दीजिए, हम ले चलते हैं। खान साहब ठहरे, बड़े ठंडे मन से बोले – यही तो बचा है, इसे भी ले लोगी? बंटवारे का पूरा दर्द खान साहब की इस बात से बाहर आ गया। जेपी और श्रीमति गांधी, दोनों ने सिर झुका लिया। जेपी अपने को संभाल नहीं पाए, उनकी आंख से आंसू गिर रहे थे।

बच्चों से निवेदन है कि आप खान अब्दुल गफ्फार खान साहब के बारे में जानो।

बोल डेस्क [चंचल की फेसबुक वाल से साभार]

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