नाव डूब गई पर सवाल तो तैरेंगे

0
44
Patna Boat Tragedy
Patna Boat Tragedy

वाट्सएप पर रोजाना दर्जनों मैसेज आते रहते हैं जिनमें से ज्यादातर को मैं नहीं पढ़ता, हाँ कुछ को सरसरी निगाह से देख जरूर लेता हूँ। पर कभी-कभी निरर्थक मैसेजों की भीड़ में कुछ काम की बातें, कुछ अच्छी सीख और कुछ तीखे सवाल भी मिल जाया करते हैं। आज ऐसा ही एक सवाल मेरे सामने आया और मैं बाध्य हो गया ये पोस्ट लिखने को।

वाट्सएप के उस मैसेज में पूछा गया था कि अभी-अभी बिहार सरकार ने गुरु गोविन्द सिंह के 350वें प्रकाश-पर्व का ऐतिहासिक आयोजन किया, जिसमें देश और दुनिया भर से लगभग 8 लाख लोग शामिल हुए। सरकार और प्रशासन की मुस्तैदी ऐसी कि किसी को एक खरोंच तक लगने की ख़बर नहीं आई। बड़े गर्व की बात है। इस आयोजन के लगभग साथ-साथ ही बुद्ध की नगरी गया में 34वीं कालचक्र पूजा का आयोजन किया गया, उसमें भी देश और दुनिया के अलग-अलग कोने से हजारों लोग आए। व्यवस्था में कहीं कोई खोट नहीं। इसी तरह हर ईद-बकरीद-मुहर्रम के दरम्यान कई बड़े आयोजन होते हैं और उनमें सरकार व प्रशासन की चुस्ती देखने लायक होती है। पर क्या कारण है कि हाल के वर्षों में पटना में दशहरा, छठ और मकर संक्रान्ति पर ही हादसे हुए?

मैसेज भेजने वाला कौन था और उसका मकसद क्या था, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम बस इतना सोचें कि क्या ये सवाल सिरे से खारिज करने लायक है? आप कह सकते हैं पटना में दशहरा, छठ और मकर संक्रान्ति के दौरान हादसा होना एक बुरा संयोग भर है। आप यह भी कह सकते हैं कि हिन्दू बहुसंख्यक हैं और इसलिए इन आयोजनों में भीड़ भी ज्यादा जुटती है, जिसे नियंत्रित करने में सरकार या प्रशासन का तंत्र विफल हुआ। ये तय है कि सरकार या प्रशासन ने ऐसा जान-बूझकर नहीं किया होगा। पर ऐसा हुआ, और हर बार कारण दैवी नहीं मानवीय थे, इससे क्या इनकार संभव है?

क्या आपको ये नहीं लगता कि चूंकि इस देश में हिन्दू के अलावे सारे धर्मावलंबी ‘अल्पसंख्यक’ हैं, इसलिए हमारी सरकारें (और ये बात कमोबेश तमाम राज्यों और केन्द्र पर भी लागू होती है) उनके मामले में ज्यादा ‘तत्परता’ दिखाती हैं, ताकि उन्हें रिझाया जा सके? खुद को ‘सहिष्णु’ बताया जा सके? और सबसे अहम ये कि चुनावों में उनका वोट पाया जा सके? यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि इस ‘तुष्टिकरण’ का सहारा अलग-अलग समय और संदर्भ में हर पार्टी लेती है। ढूँढ़ने पर भी कोई अपवाद शायद ही मिले।

चलिए मान लेते हैं, ये सारी बातें बकवास है। तो आप ही बता दीजिए कि मकर संक्रान्ति पर गंगा दियारा में आयोजित पतंग-उत्सव के दौरान नाव और स्टीमर की पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं थी? नाव में ट्यूब या जैकेट क्यों नहीं रखवाए गए थे? जिस एनआईटी घाट के निकट 25 लोगों ने ‘जलसमाधि’ ली, वहाँ एनडीआरएफ की पर्याप्त तैनाती क्यों नहीं थी? क्या किसी बड़े अधिकारी या मंत्री को इस आयोजन की देख-रेख के लिए अधिकृत किया गया था? या फिर, प्रकाशोत्सव की तरह पतंग-उत्सव की खोज-खबर हमारे मुख्यमंत्री ले रहे थे?

एक और बेहद अहम बात यह कि पतंगबाजी के आयोजन-स्थल के निकट बना डॉल्फिन अम्यूजमेंट पार्क, जिसे देखने लोगों की भारी भीड़ जुटी थी और स्थानीय लोगों के मुताबिक जो नाव डूबी, उस पर सवार लोगों में बड़ी संख्या इसी पार्क में घूमने आए लोगों की थी, का निर्माण ही अवैध था और इतनी बड़ी बात की किसी को कोई ख़बर तक न थी, क्या ये विश्वसनीय है? बताया जाता है कि जो नाव डूबी उस पर क्षमता से तीन गुना अधिक लोग सवार थे। शाम होने पर सब वापस लौटने की जल्दी में थे। हालांकि सच यह भी है कि उन सबने भी स्वविवेक से काम नहीं लिया, पर प्रश्न उठता है कि उन्हें रोकने-टोकने और भीड़ को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी जिनके ऊपर थी, वो कहाँ थे?

हो सकता है, कुछ लोग ये कहने में भी गुरेज न करें कि यहाँ उठाए गए सवाल किसी पार्टी या संगठनविशेष से प्रेरित हैं। कहने वाले इन सवालों को सांप्रदायिक भी बोल दें तो आश्चर्य की बात नहीं। पर ये मैं जानता हूँ और हृदय पर हाथ रखने पर आप भी मानेंगे कि ये सवाल किसी को दुख पहुँचाने के लिए नहीं, उन सबकी खातिर दुख जताने के लिए है जिनके घरों में अब कभी ‘मकर संक्रान्ति’ नहीं होगी। और इसलिए भी कि इससे आगे के लिए हम सबक लें।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

Comments

comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here