किताबों की संस्कृति और नॉर्वे

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औसत भारतीय किताबों पर कितना खर्च करता है? मैं कोर्स में लगी किताबों की नहीं, साहित्य की बात कर रहा हूँ। सांख्यिकी की मानें, तो नॉर्वे का हर व्यक्ति प्रत्येक साल 500 क्रोनर यानि करीब 4000 रु. की किताबें खरीदता है। मैंने कभी गौर नहीं किया, पर अब देख रहा हूँ, तो हर घर में किताबों की लड़ी याद आ रही है। बस-ट्रेन में लोग नॉवेल पढ़ते दिख रहे हैं। मतलब प्रकाशकों की चांदी है। छोटा-सा देश, अलग भाषा, फिर भी किताबें खूब छप रही हैं। दरअसल, इसमें भी नॉर्वे की सरकार ने ‘वेलफेयर स्टेट’ की भूमिका निभाई है। कोई भी किताब जब नॉर्वे प्रकाशन का नंबर पाती है, तो उसकी 1000 कॉपी सरकार अपने पुस्तकालयों के लिए खरीद लेती है। मतलब छपते ही ‘बेस्ट सेलर’। दूसरी बात, यहाँ सुपर डिस्काउंट पर पाबंदी है। किताबें हद से सस्ती नहीं बेची जा सकतीं। 20 से 25 प्रतिशत डिस्काउंट अधिक से अधिक। तीसरी बात, यहाँ किताबें प्रकाशक ही मुख्यत: बेचते हैं। यहाँ पर आप लेखक के रूप में नौकरी कर सकते हैं। आपको सरकार वेतन व पेंशन देगी, अगर आप अच्छे हैं। रॉयल्टी अलग। आप बस लिखिए।… छोटा-सा देश है, फिर भी इनके लेखकों-प्रकाशकों की हालत कहीं अच्छी है। हम तो करोड़ों के देश हैं। पूरे विश्व में फैले हैं। पुस्तक मेला लगाते हैं। फिर भी लेखकों की दुर्दशा का प्रश्न नहीं उठता।

बोल डेस्क [साभार दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, ‘साइबर संसार’ के अंतर्गत ‘नॉर्वे और किताबें’ शीर्षक से प्रकाशित प्रवीण कुमार झा के विचार]

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