क्या अपने मन का राष्ट्रपति बना पाएंगे मोदी?

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पाँच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से दो बातें साफ हो जाएंगी – पहली, नोटबंदी के बाद भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति देश का रुख क्या है? और दूसरी, जुलाई 2017 में मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल खत्म होने के बाद मोदी अपने मन का राष्ट्रपति बना पाएंगे या नहीं? पहली बात से आप चौंके नहीं होंगे, लेकिन दूसरी बात पर आप जरूर ठहर गए होंगे कि इन चुनावों से राष्ट्रपति चुनाव का आखिर क्या कनेक्शन है? यकीन मानिए, कनेक्शन है और ऐसा है कि इन राज्यों, खासकर यूपी और पंजाब, में भाजपा के नहीं जीतने पर मोदी अपने मन का राष्ट्रपति नहीं बना पाएंगे। चलिए, जानते हैं कैसे?

राष्ट्रपति चुनाव के वोटों का समीकरण देखें तो वर्तमान में एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं और अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए उसे करीब एक लाख और वोटों की जरूरत है। अभी जिन पाँच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें कुल 1, 03, 756 वोट दांव पर हैं। सबसे ज्यादा 83, 824 वोट यूपी के पास हैं और उसके बाद पंजाब की महत्वपूर्ण भूमिका है। जानकारों का मानना है कि भाजपा के यूपी और पंजाब में हारने की स्थिति में भी मोदी सरकार राष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार जिताने में कामयाब हो जाएगी। बस फर्क यह आएगा कि फिर उसे अपनी पसंद के उम्मीदवार की जगह सर्वस्वीकार्य उम्मीदवार की ओर जाना होगा। यानि ऐसा उम्मीदवार जो सभी दलों को मान्य हो।

राष्ट्रपति पद के अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए जरूरी संख्याबल न होने की स्थिति में भाजपा को अन्य क्षेत्रीय दलों से बात करनी होगी। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, बीजेडी, तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी पार्टियों की भूमिका अहम हो जाएगी और भाजपा उनके रुख की ओर देखने के लिए बाध्य होगी। कहने की जरूरत नहीं कि इस स्थिति में एनडीए को अपने उम्मीदवार का चयन सोच-समझकर करना होगा, ताकि सबकी सहमति मिल सके।

गौरतलब है कि भारत में राष्ट्रपति पद का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत किया जाता है। इसमें लोकसभा-राज्यसभा के चुने हुए सांसद और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक हिस्सा होते हैं। विधायकों के वोट का मूल्य 1971 की आबादी के आधार पर एक निश्चित अनुपात में तय किया जाता है, और सभी राज्यों और दिल्ली-पुडुचेरी विधानसभाओं के कुल मतों के बराबर लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 238 सदस्यों के वोटों का मूल्य होता है। फिलहाल एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं, जिनमें से अकेले भाजपा के पास करीब 3.68 लाख वोट हैं। वहीं, यूपीए के पास लगभग 2.30 वोट हैं, जिनमें से कांग्रेस के पास 1.50 लाख वोट हैं।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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