ओम पुरी : साधारण चेहरे वाला असाधारण कलाकार

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‘आक्रोश’ (1980) के लहण्या भीकू, ‘सद्गति’ (1981) के दुखी, ‘आरोहण’ (1982) के हरि मंडल, ‘अर्द्धसत्य’ (1983) के अनंत वलनेकर, ‘जाने भी दो यारों’ (1983) के आहूजा, ‘मिर्च मसाला’ (1985) के अबु मियां, ‘नरसिम्हा’ (1991) के बापजी, ‘माचिस’ (1996) के सनातन, ‘चाची 420’ (1997) के बनवारी लाल – यानि साधारण से दिखने वाले असाधारण कलाकार ओमपुरी नहीं रहे। अपने पूरे करियर में समानांतर और कमर्शियल सिनेमा के कई पूर्वाग्रहों और मिथकों को तोड़ने वाले इस बेजोड़ अभिनेता का शुक्रवार सुबह मुंबई के अंधेरी स्थित आवास पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। दर्शकों ने उन्हें हाल ही में ‘बजरंगी भाईजान’ और ‘घायल वन्स अगेन’ में देखा था। 1990 में ‘पद्मश्री’ और 2004 में ‘ऑनरेरी ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ से सम्मानित 66 वर्षीय ओम पुरी इन दिनों सलमान खान की फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ की शूटिंग कर रहे थे। इस फिल्म में वे एक गांधीवादी नेता की भूमिका में थे।

ओम पुरी का जन्म 18 अक्टूबर, 1950 को अंबाला में एक पंजाबी परिवार में हुआ था। 1973 में उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से ग्रैजुएशन किया और 1976 में पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षण लिया। उनके फिल्मी करियर की शुरुआत 1976 में ही मराठी फिल्म ‘घासीराम कोतवाल’ से हुई। यह फिल्म विजय तेंदुलकर के मराठी नाटक पर आधारित थी। 1980 के दशक में अमरीश पुरी, नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी, स्मिता पाटिल और ओम पुरी उन चुनिंदा एक्टर्स में शुमार हैं जिन्होंने श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलानी जैसे निर्देशकों के साथ एक के बाद एक कई फिल्में कीं और समानांतर  सिनेमा को स्थान और सम्मान दिलाया।

शुरुआती संघर्ष के बाद 1980 में आई फिल्म ‘आक्रोश’ से ओम पुरी की सफलता का सिलसिला शुरू हुआ। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर अवार्ड भी मिला, पर उनकी अभिनय-यात्रा की सबसे यादगार फिल्म रही ‘अर्द्धसत्य’, जिसने हिन्दी फिल्मों के बने-बनाए खेल की रफ्तार पलट दी। फिल्म के निर्देशक गोविन्द निहलानी इस फिल्म में उस दौर के सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को लेना चाहते थे। अमिताभ के मना करने पर ओम पुरी के नाम पर विचार हुआ। वे निहलानी के साथ कुछ साल पहले ‘आक्रोश’ में मूक-बधिर का किरदार निभा कर अपने हुनर का जलवा दिखा चुके थे। ‘अर्द्धसत्य’ ऐसी फिल्म थी, जो आलोचकों और दर्शकों द्वारा समान रूप से सराही गई। अमिताभ बच्चन की ‘कुली’ उन दिनों थियेटर में चल रही थी, बावजूद इसके यह फिल्म 22 हफ्ते चली। आगे चलकर अमिताभ ने भी माना कि अगर वे इस फिल्म में काम करते भी तो नायक पुलिस इंस्पेक्टर अनिल वेलनकर के किरदार के साथ वो न्याय नहीं कर पाते, जो ओम पुरी ने किया। यही नहीं, ‘अर्द्धसत्य’ आज भी उनकी पसंदीदा फिल्मों में एक है।

कभी अपनी कमजोर अंग्रेजी से परेशान रहने वाले ओम पुरी ने आगे चलकर हॉलीवुड और ब्रिटिश फिल्मों में भी अपना सिक्का जमाया। अस्सी और नब्बे के दशक में उन्होंने कई अंग्रेजी फिल्मों में काम किया और शोहरत हासिल की। ‘सिटी ऑफ जॉय’, ‘द फुल मॉन्टी’, ‘ईस्ट इज ईस्ट’, ‘बैंड इट लाइक बैखम’ ऐसी फिल्में हैं, जिनमें उनके काम की खास चर्चा हुई।

सैकड़ों फिल्मों में अपने अभिनय की अमिट छोड़ने के साथ-साथ ओम पुरी ने छोटे पर्दे को भी अपनी कला के अद्भुत स्पर्श से निहाल किया। ‘भारत एक खोज’, ‘तमस’, ‘कक्काजी कहिन’, ‘यात्रा’, ‘मिस्टर योगी’ और ‘सी हॉक’ जैसे धारावाहिकों को भला कौन भूल सकता है!

ओम पुरी के अभिनय की बात करते हुए उनकी जादुई आवाज़ का जिक्र बहुत जरूरी है। इस आवाज़ का उपयोग कई फिल्मों में पर्दे के पीछे हुआ। उनकी गिनती देश के सबसे अच्छे वॉइसओवर कलाकारों में होती थी। वह शुरू से जानते थे कि उनका चेहरा फिल्मी हीरो के लायक नहीं है, चेचक के दाग वाले शख्स को काम भी मिलेगा, इस पर भी उन्हें शक था। इसलिए उन्होंने शुरू से ही अपनी आवाज़ और वॉइसओवर पर खासा ध्यान दिया। यह बात अलग है कि जब भी उन्होंने अभिनय किया, तो चेहरा, दाग सब पीछे चले गए और एक कभी न भुलाया जाने वाला किरदार सबके सामने आया। अपने किरदारों के रूप में हमेशा हमलोगों के बीच थे, हैं और रहेंगे ओमपुरी। कौन कहता है, वो चले गए!

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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