सीपीईसी और बलूचिस्तान

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यह वायदा किया गया है कि बलूचिस्तान से होकर गुजरने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) से प्रांत के लोगों के लिए तरक्की के दरवाजे खुलेंगे। मगर यकीनन इसके लिए इस सूबे को कीमत भी चुकानी होगी।

फेडरेशन ऑफ पाकिस्तान चैंबर्स ऐंड इंडस्ट्री का आकलन है कि इस कॉरिडोर के बनने के बाद साल 2048 तक बलूचिस्तान की आबादी काफी ज्यादा बढ़ सकती है, क्योंकि तब यहाँ चीनी बाशिंदों और मुल्क के दूसरे हिस्सों से लोगों की आमद बढ़ जाएगी। यानि अगर सीपीईसी परियोजना पूरी होती है और अगले तीस या उससे ज्यादा वर्षों तक चीन के कारोबारी हित बने रहते हैं, तो यह सूबा एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव का गवाह बनेगा। मगर बात सिर्फ यही नहीं है। यह बदलाव अपने साथ असुरक्षा भी लेकर आएगा। ऐसे में, सवाल यह है कि इस कॉरिडोर से होने वाली माली कमाई से मूल बलूचों को कितना फायदा होगा?

हाल में बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि पिछले छह वर्षों में 1,000 के करीब सियासी कार्यकर्ताओं व संदिग्ध अलगाववादियों के शव बलूचिस्तान में मिले हैं। यह कॉरिडोर बलूच भावना को भी मजबूत नहीं बना रहा। आबादी में रद्दोबदल तभी स्वीकार होंगे, जब बलूचों को प्राथमिकता दी जाएगी, और यह तब होगा, जब यहाँ शिक्षा व स्किल ट्रेनिंग जैसे विकास से जुड़े काम होंगे। हुकूमत यहाँ के लोगों को बाज़ार के भरोसे नहीं छोड़ सकती। मुमकिन है कि इन कामों से सत्तारूढ़ दल को तुरंत सियासी फायदा न हो, पर यदि ऐसा नहीं होगा, तो हम बलूचिस्तान में और ज्यादा अविश्वास, गरीबी और हिंसा देखेंगे।

पाकिस्तान जिस तरह ‘अवसरों का देश’ बनता जा रहा है, उसमें किसी खास जगह पर जनसंख्या में रद्दोबदल होना लाजिमी है। लिहाजा जरूरी यह है कि हमारी हुकूमत अपने बाशिंदों की सुरक्षा और आर्थिक विकास सुनिश्चित करे। अपने लोगों की सुरक्षा किसी भी मुल्क का बुनियादी काम है। पैसा बनाना और चुनाव जीतना बस इसके माध्यम हैं। सीपीईसी से होने वाले बदलाव रोके नहीं जा सकते, पर उसे पाकिस्तानी नागरिकों के हितों में मोड़ा तो जा ही सकता है।

बोल डेस्क, सौ. द नेशन, पाकिस्तान में प्रकाशित आलेख बलूचिस्तान फर्स्ट

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