तो पहले से तैयार थी ‘पटकथा’..?

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मुलायम सिंह यादव का ‘समाजवादी’ कुनबा ढहते-ढहते बच गया। निष्कासन के महज चंद घंटों बाद अखिलेश-रामगोपाल की पार्टी में वापसी के साथ पिछले दो-तीन दिनों से चल रहे यूपी के हाई वोल्टेज सियासी ड्रामे का फिलहाल अंत होता दिख रहा है। इन दो-तीन दिनों के तेजी से बदलते घटनाक्रम में 200 से ज्यादा विधायकों को अपने साथ खड़ा कर अखिलेश यादव पहले से भी ज्यादा, अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर कहा जाय कि अपने पिता से भी ज्यादा, मजबूत होकर उभरे हैं।

अखिलेश द्वारा शक्ति-परीक्षण में चाचा शिवपाल (और पिता मुलायम को भी) को भी पछाड़ने के बाद उनका खेमा अब अपनी मांगों पर अड़ गया है। इन मांगों में शिवपाल के पर कतरना और अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना शामिल है। ये तो खैर तय हो ही चुका है कि उम्मीदवारों की सूची अब नए सिरे से जारी होगी और उसमें मुलायम-अखिलेश के अलावा किसी की भूमिका नहीं होगी। अखिलेश खेमा नेताजी ‘मुलायम’ को आजीवन संरक्षक और राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका में देखना चाहता है लेकिन उनके इर्द-गिर्द रहने वाले ‘षड्यंत्रकारी’ उन्हें किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं हैं।

पहले विधायकों के साथ बैठक के दौरान यह कहकर कि “मैं अपने पिता से अलग नहीं हूँ” और “नेताजी को मैं यूपी की जीत का तोहफा देना चाहता हूँ”, फिर उनसे मिलने पहुँचकर अखिलेश ने अपने पारिवारिक और राजनीतिक ‘विवेक’ का परिचय दिया। विपरीत परिस्थितियों में भी अपने और अपनी पार्टी के ‘निर्माता’ मुलायम के प्रति एक भी कटु शब्द का प्रयोग न कर उन्होंने एक साथ संवेदना और समझदारी दोनों का परिचय दिया। पिता के ‘सम्मान’ का ख्याल रख उन्होंने एक साथ दोनों खेमे की सहानुभूति पा ली। मुलायम ने भी बांहें फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आखिर उन्हें पता जो था कि उनकी हार में भी ‘जीत’ आखिर उन्हीं की है। वैसे इस पूरे प्रकरण की ऐसी व्याख्या करने वालों की भी कमी नहीं है कि सारी ‘पटकथा’ पहले से ही तैयार थी और यह ड्रामा पिता-पुत्र के द्वारा ही ‘प्रायोजित’ था ताकि यह दिखाया जा सके कि जन्मना और कर्मणा मुलायम के असली वारिस अखिलेश हैं, न कि शिवपाल या कोई और।

बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम में अखिलेश के अलावा जो शख्स पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरा है, वह आजम खान हैं। पिता-पुत्र के ‘मिलन’ के सूत्रधार वही रहे। आजम खान और अमर सिंह के तल्ख रिश्तों की सच्चाई भी किसी से छिपी नहीं है। अखिलेश और रामगोपाल का निष्कासन वापस होने के बाद आजम खान ने कहा कि समाजवादी पार्टी पूरी तरह एक है। उन्होंने कहा कि पार्टी को मुलायम सिंह यादव ने बनाया है और वह पार्टी के ‘बागबां’ हैं। आजम ने कहा कि पार्टी में जो कुछ भी चल रहा था उससे सबसे ज्यादा फिक्रमंद मुस्लिम थे क्योंकि सपा के कमजोर होने का फायदा बीजेपी को मिलता।

सूत्रों के मुताबिक रामगोपाल यादव द्वारा 1 जनवरी को बुलाया गया पार्टी का आपातकालीन राष्ट्रीय अधिवेशन अब चुनावी सभा में तब्दील होगा। इसमें खुद मुलायम भी शामिल होंगे। अधिवेशन को मुलायम के अलावा अखिलेश और आजम खान संबोधित कर सकते हैं। उम्मीद है कि कल के दिन कई महत्वपूर्ण घोषणाएं हों जिनमें अखिलेश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना शामिल है।

चलते-चलते

यूपी के इस हाई वोल्टेज ड्रामे में अपने लालूजी ने भी ‘किरदार’ निभा ही दिया। और वो भी बड़ा ‘सार्थक’। लालू ने एक ओर मुलायम को फोन कर उन्हें अखिलेश से बात करने की सलाह दी तो दूसरी ओर अखिलेश से बात कर उन्हें मुलायम से मिलने जाने को कहा। यूपी से बाहर के एकमात्र वही रहे जिन्होंने इस पूरे मामले को लेकर न केवल अपना ‘कंसर्न’ दिखाया बल्कि सच्चे अर्थों में उस परिवार और पार्टी का ‘शुभचिंतक’ होने का परिचय भी दिया।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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