अलग चले अखिलेश!

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akhilesh-yadav
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देश की राजनीति की दिशा तय करने की ताकत रखने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी टूट की कगार पर खड़ी दिख रही है। अगर एक दम से कोई चमत्कार हो और मुलायम-अखिलेश ‘समझदारी’ दिखाते हुए किसी ‘सार्थक’ निष्कर्ष पर पहुँच जाएं तो बात अलग है, वरना समाजवादी कुनबे का बिखरना तय लग रहा है। जी हाँ, अपने वफादारों की टिकट कटने से नाराज अखिलेश ने 235 उम्मीदवारों की अपनी अलग सूची जारी कर दी है। सूत्रों के मुताबिक ये उम्मीदवार बतौर निर्दलीय अलग-अलग चुनाव-चिह्नों पर चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। हालांकि अब देर हो चुकी है, फिर भी कयास इस बात के भी लगाए जा रहे हैं कि अखिलेश अपनी अलग पार्टी बनाकर नया चुनाव-चिह्न लेने की कोशिश भी कर सकते हैं।

बहरहाल, बता दें कि उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से 325 सीटों के लिए बुधवार को सपा उम्मीदवारों की सूची जारी हुई। सूची स्वयं सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने जारी की। और अब एक दिन बाद अखिलेश यादव ने ‘अपनी’ सूची जारी कर दी। अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब पार्टी दो-फाड़ होते-होते बची थी, लेकिन कुछ समय के ‘संघर्षविराम’ के बाद परिवार की लड़ाई फिर सतह पर आ गई है। एक ओर अखिलेश और उनके समर्थक नेता हैं तो दूसरी ओर उनके चाचा शिवपाल यादव। अखिलेश के साथ रामगोपाल यादव खड़े हैं तो शिवपाल के सिर पर पार्टी और परिवार के मुखिया मुलायम का हाथ है।

गौरतलब है कि 325 उम्मीदवारों की सूची जारी होने के एक दिन बाद अखिलेश ने पिता मुलायम से मुलाकात की और उम्मीदवारों के चयन पर अपनी नाराजगी जताई। अखिलेश की शिकायत थी कि उन्हें दरकिनार कर ये सूची जारी की गई है। अखिलेश को जिन नामों पर ऐतराज था उन्हें भी टिकट दिए गए। यहाँ तक कि उनके कई करीबियों के पत्ते भी साफ हो गए, जबकि दूसरी ओर शिवपाल की इस सूची में ‘जरूरत से ज्यादा’ चली।

गुरुवार सुबह से ही मुलायम, अखिलेश और शिवपाल के घरों के आगे नेताओं और कार्यकर्ताओं की भीड़ उमड़नी शुरू हो गई थी। अखिलेश ने अपने वफादार मंत्रियों और विधायकों से मुलाकात और मंत्रणा की। इस दौरान उनके विश्वासपात्रों ने शिवपाल यादव, अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा आदि पर भड़ास निकाली और साथ ही उन्हें उनका ‘बल’ भी याद दिलाया। उन्होंने अखिलेश को भरोसा दिलाया कि वे उनके साथ हैं और वे चाहें तो बड़ा कदम उठा सकते हैं। उधर गठबंधन को लेकर मुलायम से जवाब पा चुकी कांग्रेस तो इस फिराक में है ही कि अखिलेश अलग चुनाव लड़ें और कांग्रेस उनके साथ चुनाव की ‘वैतरणी’ पार कर ले।

बहरहाल, अगले एक-दो दिन में समाजवादी पार्टी के ‘भाग्य’ का फैसला हो जाएगा। भले ही मुलायम के दीर्घ राजनीतिक जीवन में परीक्षा की ऐसी घड़ी कभी न आई हो, पर विपरीत परिस्थितियों को साधने के उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर वे कोई बीच का रास्ता निकाल लें और चुनाव में सपा की चुनौती बरकरार रहे।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप 

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