‘अटल’ गरिमा और गौरव के 92 वर्ष

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अटल बिहारी वाजपेयी, ये नाम न केवल भारतीय राजनीति के उन कुछ नामों में एक है जो जनमानस में गहरी पैठ रखता है, बल्कि यह भारत के सम्पूर्ण इतिहास के उन चंद नामों में शुमार है जिन्हें सहयोगियों के समान ही विरोधियों का भी विश्वास और आदर हासिल रहा है। यह उनका करिश्माई व्यक्तित्व ही था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े होने के बावजूद उनकी धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी छवि अक्षुण्ण रही और भाजपा संघर्ष की पगडंडियों से प्रशस्त राजपथ तक पहुँची। 25 दिसंबर 1924 को गवालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी आज अपने जीवन के 92 वर्ष पूरे करने जा रहे हैं। गरिमा और गौरव से भरे 92 वर्ष, जिनका एक-एक पल किसी धरोहर से कम नहीं हमारे लिए।

वाजपेयी की जीवन-यात्रा एक ऐसे व्यक्तित्व का सफरनामा है, जिसने अपनी हर सांस के साथ भारतीय सभ्यता, संस्कृति, समाज और राजनीति को जिया और उसमें अपना निर्णायक योगदान दिया। उनकी लोकप्रियता दलगत सीमाओं से परे थी। यह उनके व्यक्तित्व का ही सम्मोहन था कि भाजपा के साथ उस समय नए सहयोगी दल जुड़ते गए, जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भाजपा अपने दक्षिणपंथी झुकाव के कारण राजनीतिक रूप से ‘अछूत’ मानी जाती थी।

वाजपेयी के लंबे राजनीतिक जीवन में एक अनोखी निरंतरता है, जो उन्हें जय-पराजय से कहीं ऊँचा उठा देती है। वह आलोचनाओं की ओर नहीं, अपने लक्ष्य की ओर देखते थे। वह जब चाहते, विपक्ष का इस्तेमाल कर लेते। विपक्षियों को भी उनके दरवाजे पर दस्तक देने में संकोच नहीं होता। वह स्वीकार्यता की सियासत करते थे, प्रतिरोध की नहीं। यह अकारण नहीं कि भारत को पहली बार छह-सात प्रतिशत की स्थिर जीडीपी ग्रोथ उन्हीं के वक्त में हासिल हुई।

कश्मीर आज की तरह तब भी बड़ी समस्या थी लेकिन वाजपेयी ने युक्तिपूर्वक कश्मीर को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में बहुत हद तक कामयाबी हासिल कर ली थी। वे जानते थे कि ऐसा पाकिस्तान से दोस्ती के बिना संभव नहीं। साथ ही उन्हें यह भी मालूम था कि पड़ोसी सिर्फ मोहब्बत की भाषा नहीं समझता। इसीलिए 1998 में दोबारा सत्ता संभालने के दो महीने के भीतर पोखरण परमाणु परीक्षण कर उन्होंने संदेश दिया कि भारत दोस्ती का तलबगार है, पर आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं। वह कभी झुकेगा नहीं। कंधार, कारगिल और संसद पर हमले के बावजूद उन्होंने सुलह की कोशिश नहीं छोड़ी। अगर आगरा शिखर-वार्ता सफल हो गई होती, तो यकीनन इस महाद्वीप की किस्मत बदल जाती। हालांकि यह वार्ता सिरे तक क्यों नहीं पहुँची, यह आज भी रहस्य है।

आज सड़क-यात्रा के शौकीन जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक फर्राटा भरने की ख्वाहिश व्यक्त करते हैं, तो एक बार फिर वाजपेयी याद आते हैं। कश्मीर को कन्याकुमारी से और कामाख्या को द्वारिका से जोड़ने का काम उनकी ‘स्वर्णिम चतुर्भुज योजना’ ने किया और उनके द्वारा लागू की गई ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ देश के यातायात को सुगम बनाने और हमारे विकास को गति देने में कितनी बड़ी भूमिका अदा कर रही है, यह कोई कहने की बात नहीं।

बीमारी ने आज इस प्रखर कवि और ओजस्वी वक्ता की वाणी और स्मृति पर कब्जा जमा लिया है। आज भाजपा के ‘मोदीयुग’ की बात की जा रही है, पर देश और दुनिया को जब भी समग्रता में देखने की बात आएगी, तब मोदी को वाजपेयी बनकर ही सोचना और देखना होगा। मोदी भाजपा को ‘विस्तार’ चाहे जितना दे लें, ‘आधार’ वाजपेयी ही हैं और वाजपेयी ही रहेंगे। भारत-रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को उनके जन्मदिवस पर ‘बोल बिहार’ की ढेरों मंगलकामनाएं।

चलते-चलते

हम ये न भूलें कि आज भारत-रत्न मदन मोहन मालवीय की जयंती भी है। उन्हें हमारा शत-शत नमन।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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