देशरत्न से जुड़ी कुछ रोचक बातें

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आज स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की 132वीं जयंती है। बिहार के जीरादेई में 3 दिसम्बर 1884 को जन्मे राजेन्द्र बाबू ने अपनी अन्तिम सांस भी बिहार में ही पटना स्थित सदाकत आश्रम में 28 फरवरी 1963 को ली। वे विलक्षण छात्र, आदर्श शिक्षक, सफल अधिवक्ता, प्रभावशाली लेखक, समर्पित गांधीवादी और स्वतंत्रता आन्दोलन में अपना सर्वस्व झोंक देने वाले सेनानी थे। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ क्या होता है, ये समझने के लिए उनसे बेहतर उदाहरण हमें ढूंढ़े नहीं मिलेगा। 1950 से 1962 तक वे देश के ‘प्रथम नागरिक’ की भूमिका में रहे। अवकाश ग्रहण करने के बाद 1962 में ही उन्हें ‘भारतरत्न’ से नवाजा गया। कहने की जरूरत नहीं कि उनका सारा जीवन ही अनमोल धरोहर है और उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें कई-कई तरह से याद कर रहा है। चलिए, आज बिहार को अखंड गौरव देने वाले इस सपूत से जुड़े कुछ ऐसे रोचक प्रसंग से रू-ब-रू होते हैं, जिनसे बहुत कम लोग वाकिफ हैं।

उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे राजेन्द्र बाबू के पूर्वज

राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से कुआं गांव, अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। इनका कायस्थ परिवार था। यहाँ के कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया और वे वहाँ से बिहार के सारन जिले के एक गांव जीरादेई में जा बसे। इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का परिवार भी था। जीरादेई के पास ही एक छोटी-सी रियासत थी – हथुआ। राजेन्द्र बाबू के दादा को पढ़े-लिखे होने के कारण इस हथिया रियासत की दीवानी मिल गई। वे 25-30 साल तक इस रियासत के दीवान रहे। धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं भी कुछ जमीन खरीद ली। राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय इस जमींदारी की देखभाल करते थे।

बारात के वधू के घर पहुँचने पर पालकी में सोए मिले वर राजेन्द्र प्रसाद

राजेन्द्र प्रसाद का विवाह 12 साल की उम्र में हुआ था। घोडों, बैलगाड़ियों और हाथी के साथ चली उनकी बारात को वधू राजवंशी देवी के घर पहुँचने में दो दिन लगे थे। वर राजेन्द्र प्रसाद चांदी की पालकी में सज-धज कर बैठे थे। लम्बी यात्रा के बाद बारात मध्य रात्रि को वधू के घर पहुँची। उस वक्त राजेन्द्र बाबू  पालकी में सोए मिले। बड़ी कठिनाई से उन्हें विवाह की रस्म के लिए उठाया गया।

पत्नी के संग बहुत कम बिता पाते थे समय

राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी उन दिनों के रिवाज के अनुसार ज्यादातर पर्दे में ही रहती थीं। छुट्टियों में घर जाने पर अपनी पत्नी को देखने या उनसे बोलने का उन्हें बहुत ही कम अवसर मिलता था। बाद में जब राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए, तब पत्नी से मिलना और भी कम हो गया। वास्तव में विवाह के प्रथम पचास वर्षों में दोनों पति-पत्नी मुश्किल से पचास महीने साथ रहे होंगे।

धरी रह गई इंग्लैण्ड जाने की तैयारी

छात्रजीवन के दौरान राजेन्द्र प्रसाद आई.सी.एस. की परीक्षा देने के लिए इंग्लैण्ड जाना चाहते थे, पर उन्हें डर था कि परिवार के लोग इतनी दूर जाने की अनुमति कभी नहीं देंगे। इसीलिए उन्होंने बड़े ही गुप्त तरीके से जहाज से इंग्लैण्ड जाने के लिए सीट का आरक्षण करवाया और बाकी प्रबंध भी कर लिया। यहाँ तक कि इंग्लैण्ड में पहनने के लिए दो सूट भी सिलवा लिए। लेकिन जिसका उन्हें डर था वही हुआ। उनके पिता ने उन्हें अनुमति नहीं दी और उन्हें बड़ी अनिच्छा से इंग्लैण्ड जाने का विचार छोड़ना पड़ा।

आज भी चालू है उनका खाता

राजेन्द्र प्रसाद के देहावसान के 50 वर्ष से ज्यादा गुजर गए, लेकिन उनका बैंक खाता उनके सम्मान में  आज भी चालू है। राजेन्द्र बाबू ने मृत्यु से कुछ समय पहले ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ‘पंजाब नेशनल बैंक’ में अपना खोता खोला था। यह खाता बैंक की पटना स्थित एग्जीबिशन रोड शाखा में 24 अक्टूबर 1962 को खोला गया था। बैंक उन्हें गर्व से अपना प्रथम ग्राहक कहता है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक फिलहाल उनके खाते में 1, 213 से कुछ अधिक रुपए हैं।

बोल डेस्क

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