क्यूबा के पर्याय कास्त्रो नहीं रहे

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क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति और वहाँ की विश्वप्रसिद्ध क्रांति के जनक फिदेल कास्त्रो नहीं रहे। अमेरिका के पड़ोस में रहकर 50 साल तक उसकी आँख की किरकिरी बने रहे इस कम्युनिस्ट सिपाही ने शुक्रवार को हमेशा के लिए आँखें मूंद लीं। जैतून के रंग की वर्दी, बेतरतीब दाढ़ी और सिगार पीने के अपने अंदाज के लिए मशहूर कास्त्रो न केवल दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिस्ट नेताओं में शुमार किए जाते थे बल्कि वे दुनिया के तीसरे ऐसे नेता थे जिन्होंने किसी देश पर लंबे समय तक राज किया हो। उन्होंने साल 1959 में क्यूबा की सत्ता संभाली और साल 2008 में खराब स्वास्थ्य के कारण सत्ता अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंपी। हालांकि तब भी पर्दे के पीछे असली ताकत वही बने रहे।

क्यूबा के समयानुसार शुक्रवार रात साढ़े दस बजे मौजूदा राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने सरकारी टेलीविजन से घोषणा की कि क्यूबा की क्रांति के सर्वोच्च कमांडर फिदेल अब नहीं हैं। इस घोषणा के साथ ही क्यूबा शोक में डूब गया और सड़कें सूनसान हो गईं। वहाँ पूरे नौ दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है। बता दें कि कास्त्रो को चाहने वाले भारत समेत दुनिया भर में हैं। भारत के तो वे अभिन्न मित्र थे। खासतौर पर जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से उनके बड़े प्रगाढ़ संबंध रहे।

फिदेल कास्त्रो साम्यवादी व्यवस्था के बहुत बड़े और मजबूत स्तम्भ थे, इतने मजबूत कि सोवियत संघ के टूट जाने के बाद भी उसमें ‘दरारें’ तक नहीं आईं। साम्राज्यवादी व्यवस्था के शोषण के खिलाफ लड़कर उन्होंने क्यूबा में साम्यवादी सत्ता स्थापित की थी। अमेरिका की दहलीज के इतने करीब होते हुए भी उन्होंने ताज़िन्दगी क्यूबा में पूंजीवादी व्यवस्था को घुसने नहीं दिया। शायद यही वजह रही कि क्यूबा की गिनती आज भी दुनिया की सबसे खुशहाल जनता वाले देशों में होती है।

अमेरिका के खिलाफ खुलकर बोलने वाली इतनी मजबूत आवाज़ अब शायद कभी न हो। उनकी एक आवाज़ से पूरा अमेरिका थर्रा जाता था। 1962 में शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ को अपनी सीमा में अमेरिका के खिलाफ मिसाइल तैनात करने की मंजूरी देकर उन्होंने पूरी दुनिया को सकते में ला दिया था। इस शख्स से दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश कितना घबराता था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने उन्हें एक अनुमान के मुताबिक 638 बार मारने की योजना बनाई पर कास्त्रो हर बार बच निकले। अमेरिका के एक नहीं, दो नहीं पूरे 11 राष्ट्रपति आए और चले गए पर कास्त्रो जहाँ थे वहीं रहे, चट्टान की तरह अडिग। उन्होंने डटकर आइजनहावर से लेकर क्लिंटन तक का सामना किया, अमेरिका की ओर से लगाए गए सभी आर्थिक प्रतिबंधों को झेला और तमाम साजिशों को अपनी चतुराई और कूटनीति से नाकाम किया। हाँ, ओबामा के शासनकाल में अमेरिका और क्यूबा के संबंधों में नए अध्याय जरूर जुड़े।

13 अगस्त 1926 को जन्मे कास्त्रो के पिता एक समृद्ध स्पेनी प्रवासी जमींदार थे और उनकी माँ क्यूबा की निवासी थीं। बचपन से ही कास्त्रो चीजों को बहुत जल्दी सीख जाते थे। वह बेसबॉल के प्रशंसक थे और कभी उनका सपना था कि नामचीन अमेरिकी लीगों में खेलें और खेल ही में अपना भविष्य बनाएं। लेकिन उनकी राह तो राजनीति देख रही थी। उन्हें आधुनिक क्यूबा का इतिहास जो गढ़ना था।

चलते-चलते

कास्त्रो जितने तेजतर्रार व्यक्तित्व के धनी थे, वक्ता भी उतने ही शानदार थे। संयुक्त राष्ट्र में सबसे लंबा भाषण देने का गिनीज रिकॉर्ड उन्हीं के नाम दर्ज है। उन्होंने 29 सितंबर 1960 को संयुक्त राष्ट्र में 4 घंटे 29 मिनट का भाषण दिया था। इतना ही नहीं, क्यूबा में में 1986 में दिया उनका एक भाषण तो 7 घंटे 10 मिनट लंबा था।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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