आज मोदी कल इंदिरा

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हाल के कुछ वर्षों में नरेन्द्र मोदी देश की राजनीतिक बहसों का केन्द्र होते चले गए हैं। देश के किसी भी कोने में कोई भी पार्टी हो, मोदी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसकी रणनीति को प्रभावित करने की स्थिति में हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। प्रशासक के तौर पर देखें तो पिछले कुछ दिनों में सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी जैसे बड़े फैसलों के बाद उनकी ‘सख्त’ (सकारात्मक अर्थ में) छवि सामने आई है। उनके इन फैसलों को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली। सर्जिकल स्ट्राइक पर तो अमूमन सारी पार्टियों ने दिल खोलकर उनका साथ दिया लेकिन नोटबंदी पर राजनीतिक पार्टियों से लेकर आम जनता तक बंटी नज़र आती है। हालांकि विरोध नोटबंदी से ज्यादा उसके बाद मची ‘अफरा-तफरी’ को लेकर है। कहा जा रहा है कि इतने बड़े फैसले से पहले सरकार ने पूरा ‘होमवर्क’ नहीं किया था। अगर इसे मान भी लिया जाय तो भी उनके राजनीतिक साहस और इच्छाशक्ति की सराहना उनके विरोधी तक कर रहे हैं, भले ही उनमें से कुछ सार्वजनिक तौर पर इसे स्वीकार न करें।

बहरहाल, मोदी के इन कठोर फैसलों के आलोक में विश्लेषक उनकी तुलना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कर रहे हैं। आज जबकि संयोग से इंदिराजी की जयंती भी है, क्यों न उनके कुछ बेहद साहसी और कठोर फैसलों की चर्चा करें जिन्होंने भारत की दशा और दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई।

सबसे पहले 1971 का युद्ध। भारत और पाकिस्तान के बीच तीसरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी के कठोर तेवरों की बहुत चर्चा होती है। वो भी तब जब माना जा रहा था कि वैश्विक मंच पर अमेरिका पाकिस्तान को शह दे रहा था। उस युद्ध में पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और दुनिया को बांग्लादेश के तौर पर एक नया मुल्क मिला। उनके इस फैसले के कारण ही उन्हें ‘आयरन लेडी’ कहा जाता है।

इसके बाद आता है 1974 का परमाणु परीक्षण। इंदिरा गांधी ने बतौर प्रधानमंत्री मई, 1974 में परमाणु परीक्षण करने की मंजूरी दी। राजस्थान के पोखरण में हुए इस परमाणु परीक्षण की भनक दुनिया के पांच शक्तिशाली देशों तक को नहीं लगी थी। इस परीक्षण के बाद ही भारत ने परमाणु संपन्न देश होने की दिशा में कदम बढ़ाए थे।

अब बात करें 1967 में शुरू हुई हरित क्रांति की। 1966 में जब इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनीं, तब देश में भुखमरी की स्थिति थी। भारत अनाज के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर था। इन परिस्थितियों में हरित क्रांति शुरू हुई और भारत जल्द ही अनाज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। इंदिरा गांधी ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी।

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक और ऐसा निर्णय था जो इंदिरा गांधी के कारण ही संभव हो पाया। 14 जुलाई 1969 की आधी रात को उन्होंने 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनके लिए ये फैसला आसान नहीं था। यहां तक कि कांग्रेस के अंदर भी इस पर एक राय नहीं थी। लेकिन इंदिरा ने ये कठिन निर्णय लिया और देश में आर्थिक स्थायित्व का दौर शुरू हुआ।

इंदिरा गांधी की बात हो और उनके नारे ‘गरीबी हटाओ’ की बात न हो ऐसा नहीं हो सकता। 1971 के चुनाव से ठीक पहले उन्होंने देश भर में ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया। गरीबों और बेरोजगारों के लिए उन्होंने कई योजनाएं शुरू कीं। हालांकि समय के साथ उनका ये नारा अपनी चमक खोता गया, लेकिन आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि मोदी के चुनावी नारे ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ से पहले तक यह देश का सबसे बड़ा चुनावी नारा बना रहा।

इन फैसलों के अलावे इंदिरा गांधी ने कुछ ऐसे फैसले भी लिए जो विवादास्पद रहे। जून 1975 में आपातकाल की घोषणा, जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार और अपने दो कार्यकाल में राष्ट्रपति शासन का हथियार की तरह (कुल 50 बार) इस्तेमाल करने को लेकर उन्हें खासी आलोचना झेलनी पड़ी। ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत तो उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी। इस ऑपरेशन के चार महीने बाद ही उनके सिख अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोलियों से छलनी कर उनकी हत्या कर दी।

इंदिरा गांधी को दिवंगत हुए 33 साल बीत गए। पर एक बात बिना किसी झिझक के कही जा सकती है कि इस 33 पर शून्य लग जाने के बाद भी उनके अवदानों को नहीं भुलाया जा सकता। स्वतंत्र भारत का इतिहास उनके बिना पूरा होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ठीक वैसे ही जैसे हमारी इक्कीसवीं सदी का इतिहास मोदी के बिना पूरा होगा, ऐसा सोचना नामुमकिन है।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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