गुब्बारे: आठ छोटी कविताएं

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gubbare
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गुब्बारे: 1

किसी भारी चीज से
बाँध देते हैं जैसे
धागा
गुब्बारे का

वैसे ही
बाँध लेता हूँ
तुमसे
स्वयं को

कि
कहीं खो न जाऊँ
जमीन और
आसमान के बीच।

गुब्बारे: 2

उड़ता हूँ
पंछियों-सा
आसमान में

थामते हैं
मुझे
तुम्हारी आँखों के
गुब्बारे।

गुब्बारे: 3

आसमान है
हवा है
आँचल भी है तुम्हारा

चलो,
खेलें
गुब्बारे से।

गुब्बारे: 4

कभी उड़ता हूँ
मैं
कभी उड़ते हैं
गुब्बारे

मैंने
सीख लिया
उड़ना
आँख-मिचौनी में।

गुब्बारे: 5

गुब्बारे
जब भीतर
उतर जाते हैं

बाँहों में
पर
आते हैं।

गुब्बारे: 6

हल्के हैं
गुब्बारे
कि
मैँ हूँ भारी?

गुब्बारे ने पूछा।

गुब्बारे: 7

तुमने
किस घागे से बाँधा
चाँद और सूरज

कब खोलोगी
अपने गुब्बारों का
राज
पृथ्वी?

गुब्बारे: 8

ढले होंगे
शब्द
गुब्बारों में

कविता ने
बनाई होगी जगह
तारों में।

डॉ. ए. दीप की कविता

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