दो पीढ़ियों की इस ‘जंग’ को समझें

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akhilesh-mulayam-shivpal
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कहने की जरूरत नहीं कि अर्थवाद, अवसरवाद और अधिकारवाद के दौर में समाजवाद अब अन्तिम सांसें ले रहा है, लेकिन आज भी तथाकथित समाजवाद का नाम लेकर राजनीति करने वालों की बात करें तो मुलायम सिंह यादव एक बड़ा नाम है। राममनोहर लोहिया होते तो राजनीति में आ चुकी गिरावट पर अपना सिर धुनते लेकिन कुछ लोग हैं जो आज भी सीना ठोक कर उनका नाम लेते हैं और उन्हें वोट भी मिलते हैं। हां, नाम की छौंक के साथ और भी कई मसाले मिलाए जाते हैं, वो बात अलग है। जो भी हो, मुलायम समाजवादी पार्टी के संस्थापक, सर्वमान्य नेता और सर्वेसर्वा रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। देश की राजनीति की धुरि कहलाने वाले उत्तर प्रदेश में अपने बूते उन्होंने एक नहीं कई बार सरकार बनाई है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन ढलती उम्र में उन्होंने अपनी विरासत बेटे अखिलेश यादव को सौंपी और वक्त ने ऐसी करवट ली कि आज अपनी बनाई पार्टी में वे स्वयं ही हाशिए पर हैं। कम-से-कम समाजवादी कुनबे में कलह के बाद का सर्वे तो यही कहता है।

उत्तर प्रदेश की सत्ता के केन्द्र में बैठे यादव परिवार के हाई वोल्टेज विवाद के बाद सी वोटर द्वारा किए गए सर्वे की मानें तो लोकप्रियता के मामले में अखिलेश अपने पिता और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से आगे निकल गए हैं। 403 सीटों पर लगभग 11 हजार लोगों के बीच किए गए इस सर्वे का मकसद यह जानना था कि पार्टी में चल रहे विवाद में किस नेता को लोगों का अधिक समर्थन मिला। इस सर्वे के अनुसार यादव वोटरों में 70.3% लोग अखिलेश को नेता और मुख्यमंत्री के रूप में चाहते हैं, जबकि मुलायम को 26.1% लोगों ने अपनी पसंद माना। मुसलमानों के बीच भी कमोबेश यही स्थिति है। 75.6% मुसलमानों ने अखिलेश को अपनी पसंद कहा, जबकि इस समुदाय के 19.4% लोग अब भी मुलायम में आस्था रखते हैं। शिवपाल यादव की बात करें तो इस सर्वे में वे अखिलेश के आसपास भी नहीं दिखते। सपा समर्थकों के बीच अखिलेश की लोकप्रियता 88.1 प्रतिशत जबकि शिवपाल की लोकप्रियता मात्र 4.6 प्रतिशत है।

गौर से देखें तो मुलायम और अखिलेश के बीच की जंग दो पीढ़ी, दो सोच और राजनीति की दो अलग शैली की जंग है। मुलायम उम्र के इस पड़ाव पर बदलने को तैयार नहीं और अखिलेश उनके सांचे में ढलने को तैयार नहीं। मुलायम के लिए शिवपाल यादव, अमर सिंह और आजम खान जैसे नाम आज भी जरूरी और प्रासंगिक हैं लेकिन अखिलेश इन प्रतीकों को लेकर नहीं चलना चाहते। हां, जरूरत के हिसाब से नए प्रतीक वे गढ़ जरूर रहे हैं। सहारा तो ऐसे प्रतीकों का वे भी लेंगे लेकिन अपना और अपने काम का चेहरा आगे रखकर, नए तौर-तरीकों के साथ।

यहां यह रेखांकित करना भी जरूरी है कि लाख असहमति के बावजूद अपने पिता और राजनीतिक गुरु के प्रति आज भी सार्वजनिक तौर पर असम्मान व्यक्त करने का दुस्साहस अखिलेश न तो कर रहे हैं, न कर सकते हैं और न उन्हें करना चाहिए। कारण ये कि मुलायम अपने निर्माता स्वयं हैं, जबकि अखिलेश की नींव मुलायम ने रखी थी। बदले संदर्भों और हालातों में मुलायम भले ही कमजोर दिख रहे हों लेकिन आज भी उनकी जड़ें इतनी मजबूत जरूर हैं कि अखिलेश की स्थिति आने वाले चुनाव में असहज हो जाए। अखिलेश को पता है कि चुनाव का बाज़ार चाहे जितना बदल गया हो, मुलायम नाम के सिक्के को खोटा बताकर वो खुद को ही कटघरे में खड़ा करेंगे।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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