बसते उत्तराखंड में उजड़ती ‘देवभूमि’

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उत्तराखंड में पौड़ी जिले के बांदुल गांव में अब एक 62 वर्षीय महिला विमला देवी ही रहती हैं। बाकी सारा गांव पलायन कर चुका है। पौड़ी के ही सिरस्वाल गांव में पहले 25 परिवार थे, मगर अब सिर्फ एक बुजुर्ग महिला रह गई है। इसी तरह, पौड़ी के कल्जीखाल के अस्वालस्यूं नगर गांव में 250 परिवारों में से 40 परिवार ही गांव में बचे हैं, यह गांव वर्ष 2000 के बाद से ज्यादा खाली हुआ है।

अर्थ व सांख्यिकी विभाग द्वारा जारी सांख्यिकी डायरी के आंकड़ों को देखें, तो पलायन से खाली होते उत्तराखंड के पहाड़ों की स्याह हकीकत सामने आती है। प्रदेश के पर्वतीय जिलों में 2,80,615 मकानों पर ताले पड़े हुए हैं। कुछ सरकारी व गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य बनने के बाद 16 साल में 32 लाख लोगों ने पहाड़ में अपना घर छोड़ दिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पहाड़ियों की पलायन की दर 2000-2010 तक 86 फीसदी हो गई है। रपट के अनुसार, उच्च हिमालयी क्षेत्र के आठ गांवों में एक दशक पहले तक 15 से 20 हजार की आबादी थी, पर मूलभूत सुविधाओं से वंचित इन गांवों में अब ढाई सौ की आबादी रह गई है। गांव के गांव उजाड़ हो चुके हैं। दुनिया के सबसे खूबसूरत ग्लेशियरों में से एक मिलन गांव में कभी 500 परिवार रहते थे, पर अब महज दो परिवार रह गए हैं। एक और सर्वे के अनुसार, प्रदेश में सबसे अधिक पलायन पौड़ी जिले से हो रहा है और दूसरा नंबर बागेश्वर का है।

उत्तराखंड के कुछ इलाकों में 2013 की आपदा के बाद भी पलायन बढ़ा है। इन क्षेत्रों में न स्कूलों की वापसी हुई, न ही अन्य ऐसे कार्य हो सके, जिन पर लोगों का गांवों में रहने का विश्वास बढ़ता। न झूला पुल बने और न ही आवाजाही के लिए व्यवस्था हो सकी। जर्जर ट्रॉलियों के गिरने से बच्चों और महिलाओं को लगातार भय-सा रहता है। राज्य के 650 आपदा प्रभावित गांवों के लिए भी पहल नहीं दिखती। राज्य के करीब 2040 प्राथमिक स्कूल इसलिए बंद होने की कगार पर हैं कि यहां मात्र दस बच्चे पढ़ते हैं। द्वाराखाल ब्लॉक के बैसुकी गांव से सारे परिवार पलायन कर चुके हैं, क्योंकि प्राथमिक शिक्षा के लिए 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।

यह हाल उस उत्तराखंड का है, जहां आंकड़ों के हिसाब से तरक्की भी हो रही है। प्रदेश में प्रति व्यक्ति औसत आय जो कुछ साल पहले लगभग 1.34 लाख रुपये थी, वह अब बढ़कर 1.51 लाख रुपये हो गई है। सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी भी बढ़ा है। इसके बावजूद अगर पलायन हो रहा है, तो इसका अर्थ है कि तरक्की कुछ क्षेत्रों में है, बाकी मे नहीं। इसका एक कारण नाबार्ड की रपट से पता लगता है। इसके अनुसार, 2004-05 में प्रदेश की जीडीपी में कृषि और संबंधित क्षेत्र का हिस्सा 27.22 फीसदी था, जो अब 9.59 फीसदी रह गया है। वैसे कारण कई हैं, पर असल सवाल पलायन रोकने और गांवों को आबाद करने का है।

बोल डेस्क, सौजन्य हिन्दुस्तान’ [पर्यावरणविद् अनिल जोशी का आलेख ‘पहाड़ के खाली होते गांवों की दास्तान’]

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